अमेरिका के दो वरिष्ठ सीनेटर्स रॉन वायडेन और रैंड पॉल ने भारत और चीन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। दोनों सांसदों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कदम 'अमेरिका के पैर पर कुल्हाड़ी मारने' जैसा होगा। सीनेट की वित्त समिति के अध्यक्ष वायडेन और केंटकी के सीनेटर पॉल ने चेतावनी दी कि ऐसे अत्यधिक शुल्क अमेरिकी उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर बोझ डालेंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी। इस विवाद की पृष्ठभूमि में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह धमकी है जिसमें उन्होंने ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर का विकल्प खोजने पर 100% टैरिफ लगाने की बात कही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस दबाव के बावजूद रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रख सकता है, क्योंकि यह उसके ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़ा मुद्दा है। व्हाइट हाउस के शीर्ष सलाहकारों ने भी संकेत दिया है कि रूस पर प्रतिबंधों का भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर प्रभाव वार्ताकारों पर छोड़ दिया गया है। सीनेटर पॉल ने सीनेट में बोलते हुए कहा कि संरक्षणवादी नीतियों का इतिहास गवाह है कि ये अंततः घरेलू अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन जैसे बड़े व्यापारिक भागीदारों के साथ टकराव अमेरिकी निर्यातकों के लिए बाजार बंद कर देगा। वहीं, सीनेटर वायडेन ने जोर देकर कहा कि व्यापार नीति को राजनीतिक बयानबाजी के बजाय आर्थिक तर्क पर आधारित होना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय ने इस मुद्दे पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सभी देशों के साथ समानता और पारस्परिक सम्मान के आधार पर व्यापार संबंध विकसित करेगा। रूसी कच्चे तेल की खरीद पर भारत का रुख स्पष्ट है कि वह अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखेगा। निष्कर्ष के तौर पर, अमेरिकी सांसदों का यह विरोध दर्शाता है कि ट्रंप की टैरिफ नीति को अपने ही देश में गंभीर चुनौती मिल रही है। यदि अमेरिका ऐसी नीतियों पर आगे बढ़ता है तो वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अस्थिरता आएगी, जिसका खामियाजा अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही भुगतना पड़ेगा। भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने और विविध बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर भी प्रस्तुत करती है।