दिल्ली उच्च न्यायालय ने जंतर मंतर पर लगातार चल रहे धरना-प्रदर्शनों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि राजधानी के मध्य में स्थित इस स्थल पर विरोध-प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि दिल्ली को बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता और सरकार को इस स्थल को पूरी तरह बंद करने पर विचार करना चाहिए। अदालत की इस टिप्पणी ने एक बार फिर विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। न्यायमूर्ति प्रसाद ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि आखिर विरोध-प्रदर्शन शहर के बीचों-बीच क्यों होने चाहिए? उन्होंने कहा कि जंतर मंतर जैसे महत्वपूर्ण स्थल पर लगातार चलने वाले धरनों से आम नागरिकों का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। यातायात बाधित होता है, व्यावसायिक गतिविधियां ठप पड़ती हैं और आसपास के कार्यालयों में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि इस स्थल को विरोध-प्रदर्शन के लिए क्यों खुला रखा गया है और इसे पूरी तरह बंद क्यों नहीं किया जा सकता? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई है। कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने अदालत की टिप्पणी को विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार पर हमला बताया है। संगठन का कहना है कि जंतर मंतर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रतीक स्थल रहा है और इसे बंद करना नागरिकों की आवाज दबाने जैसा होगा। वहीं, सरकारी पक्ष का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का दायित्व है और अनिश्चितकालीन धरनों से उत्पन्न अराजकता को रोकने के लिए उचित कदम उठाए जाने जरूरी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसले स्पष्ट दिशानिर्देश देते हैं। शीर्ष अदालत ने पूर्व में कहा था कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं है और इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। दिल्ली पुलिस पहले भी जंतर मंतर पर धरना-प्रदर्शन के लिए कड़े नियम बना चुकी है, जिसमें प्रतिभागियों की संख्या सीमित करना और समयावधि निर्धारित करना शामिल है। इसके बावजूद विभिन्न संगठन लंबे समय तक धरने पर बैठे रहते हैं, जिससे प्रशासन के लिए चुनौती खड़ी होती है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर शहरी नियोजन और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच टकराव को उजागर किया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि विरोध-प्रदर्शन के लिए शहर के बाहरी इलाकों में वैकल्पिक स्थल विकसित किए जाएं, जहां नागरिक अपनी बात रख सकें और आम जनजीवन प्रभावित न हो। अदालत का अंतिम फैसला जो भी हो, यह मामला भारतीय लोकतंत्र में असहमति की अभिव्यक्ति और सार्वजनिक व्यवस्था के संवेदनशील संतुलन पर लंबे समय तक बहस को जन्म देता रहेगा।