बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्वदेश वापसी का संकल्प दोहराया है, लेकिन उनके इस ऐलान ने पड़ोसी मुल्क में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। हसीना पर भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं, जिसके चलते उन्हें अदालत ने दोषी करार दिया है। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता के जरिए वर्चुअल संबोधन देकर अपनी वापसी की मंशा जताई, जिसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और जनता ने अपनी संप्रभुता का अपमान बताया है। ढाका में इस घटना को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार देते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। विपक्षी दलों और नागरिक समाज ने हसीना को "जनसंहारक" बताते हुए उनके खिलाफ प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। अंतरिम सरकार के सलाहकारों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी दोषी पूर्व नेता को बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए वापस नहीं आने दिया जाएगा। इस प्रकरण ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को नए निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। बांग्लादेश ने हसीना को दिल्ली में मंच प्रदान करने पर गहरी नाराजगी जताई है, जबकि भारतीय अधिकारियों ने इसे निजी कार्यक्रम बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। उधर, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता तारिक रहमान के सहयोगी ने हसीना को चुनौती देते हुए कहा कि "दिसंबर तक क्यों? उन्हें अभी आना चाहिए"। इस बयानबाजी ने दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में अविश्वास की खाई चौड़ी कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हसीना की वापसी तभी संभव है जब बांग्लादेश की अदालतें उनके खिलाफ दर्ज मामलों में राहत दें। फिलहाल उनके खिलाफ कई मुकदमे लंबित हैं, जिनमें भ्रष्टाचार से लेकर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश देने तक के आरोप शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हसीना की जल्दबाजी में की गई घोषणा उनकी हताशा दर्शाती है, क्योंकि बांग्लादेश में उनके समर्थक आधार लगातार सिकुड़ रहा है। निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि शेख हसीना की वापसी का मुद्दा महज एक नेता की घरवापसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता और दो पड़ोसी मुल्कों के आपसी विश्वास की परीक्षा बन चुका है। बांग्लादेश की जनभावना और कानूनी ढांचा जिस दिशा में इशारा कर रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि हसीना की राह आसान नहीं होगी। आने वाले दिनों में इस विवाद का हल कूटनीतिक परिपक्वता और कानूनी मर्यादा के दायरे में ही निकल सकेगा।