भाजपा शासित राज्यों में छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने आरोप लगाया है कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं करने का वादा किया था, लेकिन इसके बावजूद कई राज्यों में छात्रों पर मुकदमे चलाए जा रहे हैं। इस 'वादाखिलाफी' ने युवा आंदोलनकारियों और नागरिक अधिकार संगठनों में गहरा रोष पैदा कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया आदेश ने इस विवाद को और हवा दे दी है। शीर्ष अदालत ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को जारी रखने की अनुमति दे दी है, जिसे सीजेपी ने 'पूरी तरह अस्वीकार्य' करार दिया है। संगठन का दावा है कि यह आदेश सरकार के उस आश्वासन के विपरीत है जिसमें कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। सीजेपी ने चेतावनी दी है कि यदि आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं रोकी गई तो वे अपना विरोध प्रदर्शन फिर से शुरू करेंगे। इस बीच, असम सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सीजेपी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की घोषणा की है। यह निर्णय अन्य भाजपा शासित राज्यों के रुख से बिल्कुल अलग है, जहां छात्र नेताओं और युवा कार्यकर्ताओं पर दबाव बरकरार है। असम के इस फैसले को जहां कुछ लोग सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं अन्य इसे राजनीतिक दबाव का नतीजा बता रहे हैं। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि छात्रों की आवाज दबाने के लिए कानूनी तंत्र का दुरुपयोग लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने मांग की है कि सभी राज्यों को असम का अनुसरण करते हुए युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने चाहिए। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय से भी अपील की गई है कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करे। यह पूरा प्रकरण केंद्र और राज्य सरकारों की युवा असंतोष से निपटने की नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जहां एक ओर असम ने सुलह का रास्ता चुना है, वहीं अन्य राज्यों का कठोर रवैया आंदोलन को और भड़का सकता है। आने वाले दिनों में सीजेपी की चेतावनी और सरकारों की प्रतिक्रिया इस टकराव की दिशा तय करेगी।