पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में पिछले कुछ दिनों से जारी विरोध प्रदर्शनों ने मंगलवार को उस समय खूनी रूप ले लिया जब पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बर्बर कार्रवाई में कम से कम 30 निर्दोष नागरिकों की मौत हो गई जबकि दर्जनों अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। द गार्जियन और एनडीटीवी जैसी प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट्स में इसे 'निर्दयतापूर्ण दमन' करार दिया है। प्रदर्शनकारी पाकिस्तान द्वारा जबरन कराए जा रहे तथाकथित चुनावों का विरोध कर रहे थे, जिन्हें भारत सरकार ने 'अवैध कब्जे को छिपाने का दिखावा' बताकर सिरे से खारिज कर दिया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुजफ्फराबाद, रावलकोट और कोटली सहित कई प्रमुख शहरों में हालात बेकाबू हो गए हैं। स्थानीय निवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बिना किसी चेतावनी के सीधी गोलीबारी शुरू कर दी। टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव के दिन ही 14 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई जबकि दर्जनों अन्य घायल हुए। अस्पतालों में घायलों की भीड़ लगी हुई है और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी बताई जा रही है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सड़कें 'शवों से भरी पड़ी हैं' और प्रशासन ने इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बंद कर दी हैं ताकि सूचनाएं बाहर न जा सकें। पाकिस्तान के रवैये की निंदा करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ा बयान जारी किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि 'पाकिस्तान द्वारा पीओके में कराए जा रहे चुनाव अवैध कब्जे को वैधता देने का एक दिखावटी प्रयास मात्र हैं।' भारत ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का संपूर्ण क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान का इस पर कोई अधिकार नहीं है। वहीं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बेहद भड़काऊ बयान देते हुए कहा कि 'आजाद कश्मीर के प्रदर्शनकारी भारत जैसे दुश्मन हैं', जिससे पाकिस्तान की असली मानसिकता उजागर होती है। मानवाधिकार संगठनों ने इस घटना को 'मानवता के खिलाफ अपराध' करार देते हुए अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाकिस्तान से तत्काल हिंसा रोकने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से भी इस मामले का संज्ञान लेने की अपील की गई है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि पाकिस्तान दशकों से पीओके के संसाधनों का दोहन कर रहा है और स्थानीय लोगों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है। इस घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है। एक ओर वह कश्मीर के नाम पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घड़ियाली आंसू बहाता है, दूसरी ओर पीओके की जनता पर बर्बर अत्याचार करता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाकर पीओके में मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोके और वहां की जनता की आकांक्षाओं का सम्मान करे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना पाकिस्तान के लिए गंभीर राजनीतिक संकट पैदा कर सकती है और पीओके में आजादी की मांग और तेज हो सकती है।