केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद भाजपा सांसदों द्वारा आयोजित भव्य विदाई समारोह पर सियासी घमासान मच गया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस आयोजन पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि प्रधान का स्वागत ऐसे किया गया मानो वे कोई सुपरस्टार हों। प्रियंका ने सोशल मीडिया पर लिखे अपने पोस्ट में इस भव्य आयोजन को जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याएं चरम पर हैं, तब सत्ताधारी दल अपने एक मंत्री की विदाई पर इतना तामझाम क्यों कर रहा है। मामले की गहराई से जुड़े सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदलने की पेशकश की थी, लेकिन प्रधान ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उनसे इस्तीफा ले लिया गया। प्रधान शिक्षा मंत्रालय और कौशल विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके कार्यकाल के दौरान नई शिक्षा नीति के कार्यान्वयन और विभिन्न परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर विवाद भी सामने आए थे। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधान को बचाने के लिए ही भाजपा नेतृत्व ने उनके सम्मान में यह बड़ा आयोजन किया, ताकि जनता के बीच यह संदेश जाए कि उनका जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी विवाद का परिणाम। विपक्षी दलों ने इस आयोजन को "युद्ध जीतने जैसा स्वागत" करार दिया है। तृणमूल कांग्रेस, राजद, शिवसेना (यूबीटी) और वाम दलों के नेताओं ने एक स्वर में भाजपा की आलोचना की है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह लोकतंत्र का मजाक है कि एक मंत्री जिस पर गंभीर आरोप लगे हों, उसका ऐसा महिमामंडन किया जा रहा है। वहीं, भाजपा प्रवक्ताओं ने इसका बचाव करते हुए कहा कि प्रधान ने संगठन और सरकार में लंबे समय तक सेवा दी है, इसलिए उनका सम्मान स्वाभाविक है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह आयोजन पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा स्वतःस्फूर्त था, न कि आधिकारिक। इस बीच, इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि प्रधान के पद छोड़ने के बाद सीजेपी (सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस) के प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इन प्रदर्शनकारियों को ट्रैक किया गया, उन पर हमले हुए और उन्हें अपमानित किया गया। मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है। विपक्ष ने इसे सरकार की असहिष्णुता का प्रमाण बताते हुए कहा कि जो सरकार अपने मंत्री की विदाई पर जश्न मनाती है, वही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का दमन करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रकरण मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में आंतरिक समीकरणों और दबाव की राजनीति को उजागर करता है। प्रधान को हटाने का फैसला और फिर उनका भव्य विदाई समारोह, दोनों ही भाजपा की चुनावी रणनीति और सहयोगी दलों को साधने की कवायद का हिस्सा प्रतीत होते हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के मानसून सत्र में भी गूंज सकता है, जहां विपक्ष सरकार को घेरने की पूरी तैयारी में है। जनता के बीच यह संदेश जाने का खतरा भाजपा को भी है कि सत्ता का अहंकार उसे जनसरोकारों से दूर ले जा रहा है।