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Breaking News: दिल्ली में 11 लाख मतदाताओं के नाम सूची से गायब, SIR प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
🕒 1 day ago

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच, विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) की औपचारिक शुरुआत से पहले ही लगभग 11 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। यह आंकड़ा किसी भी चुनावी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का सूची से बाहर होना उनके संवैधानिक अधिकार का हनन माना जा रहा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और अध्ययनों के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि यह कटौती सामान्य प्रक्रिया से कहीं अधिक है। इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 68 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या, वर्ष 2025 के चुनाव में जीत के अंतर से भी अधिक है। एक स्वतंत्र अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि मतदाता सूची संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के तहत की गई ये विलोपन प्रक्रिया चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब विलोपन की संख्या जीत के अंतर को पार कर जाए, तो यह निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को सीधे तौर पर चुनौती देता है। इसने राजनीतिक दलों और नागरिक समाज संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। यह स्थिति केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। जिन राज्यों में SIR के तीसरे चरण की प्रारंभिक सूचियाँ जारी हुई हैं, वहां मतदाता सूचियों में 15 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में तो आगामी SIR प्रक्रिया के तहत 1.22 करोड़ नोटिस जारी किए जाने की तैयारी है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। आलोचकों का तर्क है कि SIR के मौजूदा सुरक्षा उपाय (सेफगार्ड) इस पैमाने की कवायद के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। मतदाताओं को पर्याप्त सूचना दिए बिना, उनके दावे-आपत्ति दर्ज कराने के उचित अवसर के अभाव में नाम हटाना प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ मताधिकार के दमन का संकेत देता है। चुनाव आयोग और संबंधित राज्य निर्वाचन अधिकारियों पर अब दबाव बढ़ रहा है कि वे इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराएं और गलत तरीके से हटाए गए नामों को तत्काल बहाल करें। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में बना रहे और उसे अपने मताधिकार का प्रयोग करने का पूरा अवसर मिले। इस प्रकरण ने एक बार फिर चुनावी सुधारों और मतदाता सूची प्रबंधन में पारदर्शिता लाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है, ताकि भविष्य में ऐसी विसंगतियों की पुनरावृत्ति न हो।

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✍️ By Pradeep Yadav | 06 Sep 2026