विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि नई दिल्ली इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए किसी भी संभव सहायता के लिए तैयार है। कीव यात्रा के दौरान दिए गए अपने बयान में उन्होंने जोर देकर कहा कि संवाद और कूटनीति ही इस संकट का एकमात्र समाधान है। जयशंकर के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की संतुलित और सक्रिय विदेश नीति के रूप में देखा जा रहा है, जहां वह शांति प्रयासों में रचनात्मक भूमिका निभाने का इच्छुक है। रूसी तेल खरीद पर पश्चिमी देशों की आलोचनाओं का जवाब देते हुए विदेश मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि रूसी तेल खरीदना या न खरीदना यूक्रेन संकट का समाधान नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों का ध्यान रखना है और यह निर्णय राष्ट्रीय हित में लिया गया है। जयशंकर ने बताया कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच भारत ने अपने नागरिकों के लिए सस्ती और स्थिर ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया है, जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अधिकार है। अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदारों पर प्रतिबंध लगाने के संकेतों के बीच जयशंकर का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि संघर्ष का हल बातचीत की मेज पर ही निकलेगा, न कि एकपक्षीय दबाव या प्रतिबंधों से। विदेश मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि भारत शुरू से ही संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का समर्थन करता रहा है, लेकिन साथ ही वह व्यावहारिक कूटनीति में विश्वास रखता है जो सभी पक्षों की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखे। कीव में यूक्रेनी नेतृत्व के साथ हुई बैठकों का जिक्र करते हुए जयशंकर ने बताया कि भारत मानवीय सहायता भेजने के साथ-साथ शांति प्रक्रिया में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बार-बार यह दोहराया है कि यह युद्ध का युग नहीं है और मतभेदों को बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए। इस यात्रा को भारत की उस नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है जिसमें वह ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर उभरा है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि जयशंकर के बयानों ने भारत की विदेश नीति की परिपक्वता और स्वतंत्रता को फिर से रेखांकित किया है। एक ओर जहां भारत शांति के लिए सक्रिय पहल की पेशकश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपने रणनीतिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं कर रहा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह संदेश स्पष्ट है कि भारत नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का पक्षधर है, लेकिन वह अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर किसी दबाव में नहीं आएगा।