नेपाल में गत सप्ताह आई भीषण अचानक बाढ़ के सात दिन बीत जाने के बाद भी बचाव और तलाशी अभियान पूरी तेजी के साथ जारी हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने देश के कई जिलों में भारी तबाही मचाई है, जिसमें सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं जबकि दर्जनों अब भी लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार, बाढ़ और भूस्खलन की इन घटनाओं में अब तक दो सौ से अधिक लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है, वहीं पचास से अधिक लोग अभी तक लापता हैं जिनकी तलाश में सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय स्वयंसेवक दिन-रात लगे हुए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में संचार और यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो जाने के कारण राहत कार्यों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस त्रासदी के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री ने भारत और चीन समेत कई मित्र राष्ट्रों द्वारा त्वरित सहायता भेजने के लिए आभार व्यक्त किया है। भारत की ओर से राहत सामग्री, दवाएं और बचाव उपकरणों के साथ एनडीआरएफ की विशेष टीमें भेजी गई हैं, जबकि चीन ने भी हेलीकॉप्टर और आपातकालीन राहत सामग्री उपलब्ध कराई है। हालांकि, नेपाल के एक वरिष्ठ मंत्री ने इस आपदा के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार ठहराते हुए जलवायु परिवर्तन के नाम पर मुआवजे की मांग भी उठाई है। पूर्व प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल ने तो यहां तक कह दिया है कि अमेरिका, चीन और भारत जैसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों को नेपाल को हुई इस क्षति की भरपाई करनी चाहिए। प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने वाले पत्रकारों और अधिकारियों ने भयावह मंजर का वर्णन किया है। पूरे के पूरे गांव मलबे में दब गए हैं, नदियों ने अपना रास्ता बदल लिया है और सैकड़ों घर, पुल तथा सड़कें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। सिंधुपालचौक, कावरे और दोलखा जैसे जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं जहां राहत शिविरों में हजारों विस्थापित परिवार शरण लिए हुए हैं। इन शिविरों में भोजन, स्वच्छ पेयजल और दवाओं की कमी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में और बारिश की चेतावनी जारी की है, जिससे बचाव कार्यों में और बाधा आने की आशंका है। नेपाल सरकार ने आपदा प्रबंधन कोष को सक्रिय करते हुए मृतकों के परिजनों को तत्काल राहत राशि देने की घोषणा की है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दीर्घकालिक पुनर्निर्माण के लिए सहयोग की अपील की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर झीलों के फटने और असामान्य बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिसके लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना और बुनियादी ढांचे को जलवायु अनुकूल बनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। इस भीषण त्रासदी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को उजागर कर दिया है। जहां तत्काल प्राथमिकता लापता लोगों को ढूंढना और विस्थापितों को राहत पहुंचाना है, वहीं दीर्घकालिक दृष्टिकोण से नेपाल जैसे संवेदनशील देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और तकनीकी सहयोग की सख्त जरूरत है। इस संकट की घड़ी में पड़ोसी देशों द्वारा दिखाई गई त्वरित एकजुटता सराहनीय है, लेकिन वास्तविक चुनौती अब पुनर्निर्माण और भविष्य में ऐसी आपदाओं से निपटने की तैयारी में निहित है।