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Breaking News: नेपाल में बाढ़ की तबाही: जलवायु न्याय की मांग और बड़े राष्ट्रों की जिम्मेदारी
🕒 5 days ago

हिमालयी देश नेपाल इन दिनों भीषण बाढ़ की चपेट में है, जिसने सैकड़ों जिंदगियों को तबाह कर दिया है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश और हिमनदों के पिघलने से नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। इस प्राकृतिक आपदा में अब तक दो सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल सरकार ने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल सहायता की गुहार लगाई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस त्रासदी के पीछे जलवायु परिवर्तन की साफ झलक दिखाई दे रही है, जिसके लिए नेपाल खुद जिम्मेदार नहीं है। बाढ़ का सबसे भयावह मंजर पवित्र पर्वत कैलाश और मानसरोवर क्षेत्र में देखने को मिला, जहां हजारों तीर्थयात्री फंस गए थे। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ये श्रद्धालु अपनी आस्था के बल पर प्राकृतिक आपदा का सामना करते रहे। वहीं, तिब्बत क्षेत्र में आई बाढ़ को लेकर चीन की भूमिका सवालों के घेरे में है। स्क्रॉल डॉट इन की खबर के मुताबिक, चीन बाढ़ से जुड़े वीडियो डिलीट कर और खबरों को सेंसर कर नैरेटिव पर कड़ा नियंत्रण बनाए हुए है। इससे बचाव कार्यों में पारदर्शिता बाधित हो रही है और प्रभावितों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पा रही। नेपाल के प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बड़े औद्योगिक राष्ट्र ही इस त्रासदी के असली दोषी हैं। नेपाल का कार्बन उत्सर्जन नगण्य है, फिर भी वह इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल-चीन सीमा पर आई इस आपदा ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की नाजुकता को उजागर किया है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, अनियमित मानसून और चरम मौसमी घटनाएं अब नई सामान्य बनती जा रही हैं। जलवायु न्याय की मांग करते हुए नेपाल ने विकसित देशों से नुकसान और क्षति कोष में योगदान बढ़ाने, तकनीकी हस्तांतरण करने और अनुकूलन क्षमता विकसित करने में मदद की अपील की है। टेलीग्राफ इंडिया ने इसे 'प्रकृति का प्रकोप' बताते हुए चेताया है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो हिमालयी क्षेत्र में ऐसी तबाही आम हो जाएगी। नेपाल के पहाड़ी जिलों में सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं, जिससे राहत कार्य बेहद मुश्किल हो रहा है। इस त्रासदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान का यथार्थ है। बड़े राष्ट्रों को अपनी नैतिक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए नेपाल जैसे संवेदनशील देशों की मदद के लिए आगे आना होगा। केवल सहानुभूति नहीं, ठोस वित्तीय और तकनीकी प्रतिबद्धता की जरूरत है। विश्व समुदाय को समझना होगा कि हिमालय की रक्षा पूरी मानवता की रक्षा है, क्योंकि यहां के हिमनद एशिया की प्रमुख नदियों के स्रोत हैं। अब वक्त आ गया है कि जलवायु न्याय को सिद्धांत से उतारकर व्यवहार में लाया जाए।

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✍️ By Pradeep Yadav | 02 Sep 2026