नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 768 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 3,000 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। यह प्राकृतिक आपदा पिछले कुछ दिनों में हुई मूसलाधार बारिश के कारण आई, जिससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ गया और कई गांव पूरी तरह जलमग्न हो गए। सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में काठमांडू घाटी, सिंधुपालचौक, और दोलखा जिले शामिल हैं, जहां बचाव दल दिन-रात एक कर फंसे हुए लोगों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। सबसे गंभीर स्थिति त्रिशूली नदी पर बनी जलविद्युत परियोजना की सुरंग में फंसे मजदूरों की है, जहां बचावकर्मी मलबे को ड्रिल करके अंदर फंसे श्रमिकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ भाग्यशाली मजदूर किसी तरह सुरंग से बाहर निकलने में सफल रहे, लेकिन उनकी आपबीती बेहद भयावह है। उन्होंने बताया कि पानी का बहाव इतना तेज था कि चंद मिनटों में ही सुरंग भर गई और उन्हें अंधेरे में घंटों तक मौत का सामना करना पड़ा। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय स्वयंसेवक संयुक्त रूप से राहत कार्य चला रहे हैं, लेकिन खराब मौसम और टूटी सड़कें अभियान में बाधा डाल रही हैं। इस त्रासदी का असर सीमावर्ती भारतीय इलाकों पर भी पड़ रहा है। बिहार के कुशीनगर और गंडक नदी के किनारे बसे गांवों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि नेपाल से निकलने वाली त्रिशूली नदी का पानी गंडक में मिलकर जलस्तर तेजी से बढ़ा रहा है। प्रशासन ने अलर्ट जारी कर निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। एनडीटीवी के अनुसार, नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सहायता की मांग की है, जिसके बाद भारत, चीन और अन्य देशों ने राहत सामग्री और बचाव उपकरण भेजने शुरू कर दिए हैं। मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों में और बारिश की चेतावनी दी है, जिससे हालात और बिगड़ने की आशंका है। यूएस जियोलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट में इस घटना को 2026 का सबसे बड़ा मलबा हिमस्खलन और अचानक आई बाढ़ करार दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित निर्माण कार्यों ने इस आपदा को और विकराल बना दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री ने आपात बैठक बुलाकर राहत कार्यों की समीक्षा की और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की घोषणा की है। इस विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया है। जहां तत्काल प्राथमिकता फंसे हुए लोगों को बचाना और राहत पहुंचाना है, वहीं दीर्घकालिक तौर पर ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ बुनियादी ढांचा और पारिस्थितिकी संरक्षण पर ध्यान देना होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी जलवायु न्याय के सिद्धांत पर नेपाल जैसे संवेदनशील देशों की मदद के लिए आगे आना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को टाला जा सके।