नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ ने सैकड़ों गांवों को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे अब तक 682 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 2400 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। खालसा एड के स्वयंसेवकों ने तबाही का मंजर बयां करते हुए कहा कि शव कीचड़ में दबे हुए हैं और कई परिवार सदमे में भोजन तक ग्रहण करने से इनकार कर रहे हैं। यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में अब तक की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। बचाव अभियान लगातार पांचवें दिन भी युद्ध स्तर पर जारी है। सेना, पुलिस और स्वयंसेवी संगठन मिलकर दूरदराज के इलाकों में फंसे लोगों को निकालने का प्रयास कर रहे हैं। अब तक 108 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया है, जिनमें जलविद्युत सुरंग में फंसे चार कर्मचारी भी शामिल हैं। भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने विशेष रूप से कहर बरपाया है, जिसे 'हिमालयी त्रासदी' की संज्ञा दी जा रही है। पश्चिम बंगाल के 37 लोगों सहित सैकड़ों परिवार अभी भी अपने परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं, जिससे चिंता और बढ़ गई है। राहत शिविरों में हालात बेहद गंभीर हैं। विस्थापित परिवारों के पास न तो पर्याप्त भोजन है और न ही स्वच्छ पेयजल। कई परिवार तो अपने प्रियजनों को खोने के गम में इतने डूबे हैं कि उन्होंने राहत सामग्री लेने से भी मना कर दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने महामारी फैलने की आशंका जताई है, क्योंकि मलबे और गंदे पानी के कारण संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ गया है। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सहायता की अपील की है, जबकि पड़ोसी देश भारत भी लगातार मदद भेज रहा है। मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों तक और बारिश की चेतावनी दी है, जिससे बचाव कार्यों में और बाधा आ सकती है। नदियों का जलस्तर अभी भी खतरे के निशान से ऊपर बना हुआ है। भूस्खलन की घटनाएं भी लगातार हो रही हैं, जिससे पहाड़ी इलाकों तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि कई इलाके अभी भी पूरी तरह से कटे हुए हैं। इस भयावह त्रासदी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास की भयानक तस्वीर सामने रख दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण और नदियों के प्राकृतिक मार्ग में छेड़छाड़ ने इस आपदा को और विकराल बना दिया है। अब जरूरत है कि राहत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालिक योजना बनाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी तबाही से बचा जा सके। नेपाल के पुनर्निर्माण में लंबा समय लगेगा, लेकिन मानवीय संवेदना और सामूहिक प्रयास ही इस दुख की घड़ी में एकमात्र सहारा हैं।