चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के वरिष्ठ जनरल झाओ जोंगकी को शीर्ष सैन्य सलाहकार निकाय से हटा दिया गया है। जनरल झाओ वही अधिकारी हैं जिन्होंने 2017 के डोकलाम गतिरोध और 2020 के गलवान घाटी संघर्ष में भारत के खिलाफ चीनी सैन्य अभियानों की कमान संभाली थी। इस कदम को राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और सैन्य नेतृत्व में फेरबदल की नवीनतम कड़ी माना जा रहा है। चीनी मीडिया और भारतीय समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, जनरल झाओ को केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) की राजनीतिक कार्य विभाग की शीर्ष सलाहकार समिति से मुक्त कर दिया गया है। जनरल झाओ जोंगकी लंबे समय तक पश्चिमी थिएटर कमान के कमांडर रहे, जिस पर भारत के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सुरक्षा का जिम्मा है। उनके कार्यकाल में ही 2017 में भूटान के डोकलाम क्षेत्र में भारत और चीन के बीच 73 दिनों तक गतिरोध चला था। इसके तीन साल बाद, जून 2020 में गलवान घाटी में हुए हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे, जबकि चीन ने भी हताहतों की बात मानी थी। इन दोनों घटनाओं ने भारत-चीन संबंधों को दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। जनरल झाओ को इन अभियानों का मुख्य रणनीतिकार माना जाता रहा है। शी जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से पीएलए में बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चल रहा है। पिछले दो वर्षों में रक्षा मंत्री ली शांगफू, पूर्व रॉकेट फोर्स कमांडर ली युचाओ और कई अन्य शीर्ष जनरलों को भ्रष्टाचार के आरोप में पद से हटाया जा चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि जनरल झाओ को हटाने का निर्णय भी इसी आंतरिक राजनीतिक शुद्धिकरण का हिस्सा है, हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई विशेष कारण नहीं बताया गया है। कुछ विशेषज्ञ इसे सीमा पर विफल रणनीति के लिए जवाबदेही तय करने से भी जोड़कर देख रहे हैं, क्योंकि गलवान के बाद भारत ने सीमा पर बुनियादी ढांचे और सैन्य तैनाती को अभूतपूर्व गति से मजबूत किया है। इस घटनाक्रम का भारत-चीन सीमा वार्ता पर भी असर पड़ सकता है। जनरल झाओ की अनुपस्थिति में पश्चिमी थिएटर कमान का नया नेतृत्व सीमा प्रबंधन के प्रति कैसा रुख अपनाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सीमा पर शांति द्विपक्षीय संबंधों की पूर्वशर्त है। सैन्य कमांडर स्तर की वार्ताओं में अब तक सीमित प्रगति हुई है। नए चीनी सैन्य नेतृत्व के रवैये से ही तय होगा कि एलएसी पर तनाव कम होता है या नए मोड़ लेता है। निष्कर्षतः, जनरल झाओ जोंगकी को हटाना चीन की आंतरिक सैन्य राजनीति का प्रतिबिंब तो है ही, साथ ही यह भारत के लिए रणनीतिक संकेत भी देता है। शी जिनपिंग की पकड़ मजबूत करने की कवायद में पीएलए का चेहरा बदल रहा है, लेकिन सीमा पर शांति और स्थिरता के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारस्परिक विश्वास की जरूरत बनी हुई है। भारत को अपनी तैयारी जारी रखते हुए कूटनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर सतर्क रहना होगा।