नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने भयंकर तबाही मचाई है और मरने वालों की संख्या 620 को पार कर गई है। मौसम विभाग ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में भारी बारिश का पूर्वानुमान जताया है, जिससे राहत और बचाव कार्यों में गंभीर बाधा आने की आशंका है। नेपाल के विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है कि सीमावर्ती क्षेत्र दलदली भूमि में तब्दील हो चुके हैं और नए बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। इस प्राकृतिक आपदा ने देश की अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचाई है और अनुमान है कि बाढ़ से हुआ नुकसान देश की अर्थव्यवस्था के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर है। बचाव अभियान में लगी टीमों के सामने मौसम सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन के कारण हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर पा रहे हैं और सड़क मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हैं। दूरदराज के गांवों में फंसे हजारों लोग भोजन, पानी और दवाओं के इंतजार में हैं। सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्वयंसेवी संगठन दिन-रात एक करके लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में जुटे हैं, लेकिन खराब मौसम उनकी रफ्तार धीमी कर रहा है। राहत की बात यह है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहायता का सिलसिला तेज हो गया है। केवल तीन दिनों में राहत कोष में दो अरब रुपये से अधिक की राशि जमा हो चुकी है। भारत, चीन और अन्य पड़ोसी देशों के अलावा संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी मदद के हाथ बढ़ाए हैं। पोप फ्रांसिस ने भी वेटिकन के माध्यम से नेपाल को मानवीय सहायता भेजी है। सरकार ने बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की घोषणा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ऐसी चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। नेपाल की भौगोलिक स्थिति इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। इस त्रासदी ने आपदा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने, पूर्व चेतावनी तंत्र को बेहतर बनाने और नदी तटों पर बसे समुदायों के लिए सुरक्षित पुनर्वास नीति की आवश्यकता को रेखांकित किया है। इस विकट परिस्थिति में नेपाल की जनता ने अद्भुत जीवटता और एकजुटता का परिचय दिया है। स्थानीय समुदाय, युवा स्वयंसेवक और धार्मिक संगठन मिलकर राहत शिविर चला रहे हैं और प्रभावित परिवारों को हर संभव मदद पहुंचा रहे हैं। सरकार को अब तत्काल राहत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालिक पुनर्निर्माण और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों के प्रभाव को कम किया जा सके।