प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान की चार दिवसीय यात्रा शुरू की है। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना और आतंकवाद मुक्त क्षेत्र की दृष्टि को आगे बढ़ाना है। प्रधानमंत्री ने रवाना होने से पहले अपने बयान में कहा कि वह मध्य एशियाई देशों के साथ बहुआयामी संबंधों को गहरा करने और क्षेत्रीय सुरक्षा, संपर्कता तथा व्यापार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आशान्वित हैं। यह दौरा भारत की 'मध्य एशिया नीति' के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जहां भारत इस क्षेत्र को अपनी विस्तारित पड़ोस नीति का अभिन्न अंग मानता है। उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, विशेषकर आतंकवाद, कट्टरपंथ और मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए सामूहिक दृष्टिकोण पर जोर देंगे। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का शिकार रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की वकालत करता आया है। इस सम्मेलन में रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान सहित अन्य सदस्य देशों के नेता भी भाग ले रहे हैं, जिससे द्विपक्षीय वार्ताओं के अवसर भी प्राप्त होंगे। प्रधानमंत्री उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे, जिसमें व्यापार, निवेश, ऊर्जा, कृषि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने पर चर्चा होगी। यात्रा के दूसरे चरण में प्रधानमंत्री मोदी किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक जाएंगे, जहां वे किर्गिज गणराज्य के राष्ट्रपति सदिर जापारोव के साथ वार्ता करेंगे। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, खनन, फार्मास्यूटिकल्स और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर बातचीत होने की संभावना है। भारत किर्गिस्तान को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है और वहां भारतीय समुदाय की उपस्थिति दोनों देशों के बीच जीवंत सेतु का काम करती है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) और चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक भारत की पहुंच बढ़ाने के लिए संपर्क परियोजनाओं पर भी विचार-विमर्श होगा, जो क्षेत्रीय व्यापार को नई गति दे सकता है। मध्य एशिया भौगोलिक रूप से भारत के निकट है और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा सभ्यतागत संबंधों से जुड़ा हुआ है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ा है, जिसके चलते भारत के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और भी आवश्यक हो गया है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा मध्य एशियाई गणराज्यों के साथ भारत के संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। एससीओ मंच का उपयोग करते हुए भारत क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि के लिए एक समावेशी, सहयोगी और टिकाऊ ढांचे की वकालत करेगा, जो उसकी 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास' की वैश्विक दृष्टि के अनुरूप है। निष्कर्षतः, प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान यात्रा भारत की मध्य एशिया नीति को गति प्रदान करेगी और आतंकवाद मुक्त, सुरक्षित तथा समृद्ध क्षेत्र की परिकल्पना को साकार करने में सहायक सिद्ध होगी। एससीओ शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ताओं के ठोस परिणाम क्षेत्रीय सहयोग की नई रूपरेखा तैयार करेंगे, जिससे न केवल भारत बल्कि संपूर्ण मध्य एशियाई क्षेत्र लाभान्वित होगा।