तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में शुक्रवार को आए विनाशकारी भूस्खलन ने नेपाल सीमा से सटे चीन के महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया है। इस प्राकृतिक आपदा में एक बड़ा परिसर पूरी तरह से मलबे में दब गया है, जबकि बचाव दल अब भी 360 से अधिक लापता लोगों की तलाश में जुटे हुए हैं। घटना की गंभीरता को देखते हुए चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग स्वयं शनिवार को प्रभावित क्षेत्र पहुंचे और राहत कार्यों का जायजा लिया। यह भूस्खलन उस समय आया जब क्षेत्र में भारी बारिश के कारण अचानक बाढ़ जैसे हालात बन गए थे, जिससे सीमावर्ती इलाकों में भारी तबाही मची है। बचाव अभियान में हजारों की संख्या में सैनिक, पुलिसकर्मी और स्वयंसेवक दिन-रात लगे हुए हैं। मलबे के नीचे दबे लोगों को निकालने के लिए भारी मशीनरी के साथ-साथ खोजी कुत्तों और ड्रोन कैमरों का भी सहारा लिया जा रहा है। ग्यिरोंग काउंटी में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टरों की मदद ली जा रही है, क्योंकि भूस्खलन के कारण सड़क मार्ग पूरी तरह से अवरुद्ध हो गए हैं। हवाई तस्वीरों से पता चलता है कि नेपाल सीमा के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक परिसर पूरी तरह से कीचड़ और चट्टानों के नीचे समा गया है। इस क्षेत्र को चीन-नेपाल व्यापार का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर भी गहरा असर पड़ा है। प्रधानमंत्री ली कियांग ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद अधिकारियों को निर्देश दिए कि लापता लोगों की तलाश में कोई कसर न छोड़ी जाए और घायलों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाए। उन्होंने कहा कि लोगों की जान बचाना पहली प्राथमिकता है। चीनी सरकार ने आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को उच्चतम स्तर पर सक्रिय कर दिया है और प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय, भोजन और चिकित्सा व्यवस्था की गई है। मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों तक क्षेत्र में और बारिश की चेतावनी जारी की है, जिससे बचाव कार्यों में और बाधा आ सकती है। इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। नेपाल सरकार ने भी चीन को हर संभव सहायता की पेशकश की है, क्योंकि यह घटना दोनों देशों की सीमा के निकट हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस त्रासदी पर दुख व्यक्त किया है और सहायता की पेशकश की है। फिलहाल बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी है, लेकिन मलबे की गहराई और खराब मौसम के कारण अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। इस त्रासदी ने सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में राहत कार्यों की गति और मौसम की स्थिति ही तय करेगी कि कितने लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकता है।