अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को कांग्रेस की मंजूरी के लिए भेज दिया है, लेकिन इस ऐतिहासिक सौदे के साथ एक बेहद अहम और विवादास्पद शर्त भी जोड़ दी गई है। समझौते के मुताबिक, रियाद को इस परमाणु तकनीक हासिल करने के लिए इजराइल को औपचारिक रूप से मान्यता देनी होगी और उसके साथ राजनयिक संबंध सामान्य बनाने होंगे। यह कदम मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत देता है, जहां परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को क्षेत्रीय शांति प्रक्रिया से सीधे जोड़ दिया गया है। इस समझौते को '123 समझौते' के रूप में जाना जाता है, जो अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत आता है। इसके तहत अमेरिका सऊदी अरब को परमाणु रिएक्टर, ईंधन और तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान कर सकेगा। बदले में सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना होगा और यूरेनियम संवर्धन या प्लूटोनियम पुनर्संसाधन जैसी संवेदनशील गतिविधियों से परहेज करना होगा। हालांकि, विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इस बात को लेकर चिंतित है कि इस क्षेत्र में परमाणु तकनीक का प्रसार भविष्य में हथियारों की होड़ को जन्म दे सकता है, खासकर तब जब ईरान का परमाणु कार्यक्रम पहले से ही वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। कांग्रेस के पास अब इस समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिनों का सत्रीय समय है। इस दौरान सांसद इसके हर पहलू की गहन जांच करेंगे, जिसमें परमाणु अप्रसार की गारंटी, सऊदी अरब के मानवाधिकार रिकॉर्ड और क्षेत्रीय स्थिरता पर इसके प्रभाव शामिल हैं। कई प्रभावशाली सीनेटरों ने पहले ही आशंका जताई है कि बिना 'गोल्ड स्टैंडर्ड' शर्तों के - जिसमें यूरेनियम संवर्धन पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल हो - यह सौदा खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। वहीं, ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि अगर अमेरिका यह सौदा नहीं करता तो रूस या चीन इस खालीपन को भर देंगे, जिससे अमेरिकी प्रभाव कम होगा और सुरक्षा मानकों पर नियंत्रण कमजोर पड़ेगा। इजराइल को मान्यता देने की शर्त इस समझौते को अब्राहम समझौतों की कड़ी में अगला बड़ा कदम बनाती है। सऊदी अरब लंबे समय से फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को इजराइल से संबंध सामान्य बनाने की पूर्व शर्त बताता रहा है, लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में देश की विदेश नीति में व्यावहारिक बदलाव देखा जा रहा है। यदि सऊदी अरब इस शर्त को स्वीकार करता है, तो यह मुस्लिम दुनिया के सबसे प्रभावशाली देश और यहूदी राज्य के बीच संबंधों के एक नए युग की शुरुआत होगी, जिससे पूरे मध्य पूर्व का सामरिक समीकरण बदल सकता है। अंत में, यह समझौता अभी अंतिम मंजिल से दूर है। कांग्रेस की कठोर समीक्षा, सऊदी अरब की आंतरिक राजनीतिक गणनाएं और फिलिस्तीन मुद्दे पर अरब जगत की संवेदनशीलता इसके रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। फिर भी, परमाणु ऊर्जा को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की यह रणनीति दर्शाती है कि वाशिंगटन क्षेत्र में अपने दीर्घकालिक हितों को साधने के लिए ऊर्जा कूटनीति को नया आयाम दे रहा है। आने वाले महीने तय करेंगे कि क्या यह 'परमाणु कूटनीति' मध्य पूर्व में स्थाई शांति का मार्ग प्रशस्त करती है या नए तनावों को जन्म देती है।