देश में चीनी की उपलब्धता को लेकर अप्रत्याशित मोड़ आया है। कभी अधिशेष उत्पादन का दावा करने वाला भारत आज चीनी की कमी और आसमान छूती कीमतों से जूझ रहा है। बीते कुछ महीनों में खुदरा बाजार में चीनी के दाम 44-45 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए हैं, जो आम उपभोक्ता की जेब पर भारी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अचानक नहीं आया, बल्कि नीतिगत देरी, उत्पादन में गिरावट और इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के बड़े हिस्से के मोड़ के कारण पैदा हुआ है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में सूखे और असमान बारिश के चलते चालू सीजन में गन्ने का रकबा और उत्पादन दोनों घटे हैं। चीनी मिलों ने पेराई सत्र देर से शुरू किया, जिससे रिकवरी दर प्रभावित हुई। दूसरी ओर, सरकार की इथेनॉल मिश्रण नीति के तहत गन्ने के रस और शीरे का बड़ा हिस्सा इथेनॉल बनाने में लगाया गया, जिससे चीनी उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपलब्धता घटी। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने निर्यात प्रतिबंध और भंडार सीमा लगाने में देरी की, जिससे बाजार में सट्टेबाजी को बल मिला। होटल, मिठाई और प्रसंस्कृत खाद्य उद्योग पर इस मूल्य वृद्धि की सीधी मार पड़ी है। मैसूर के होटल उद्योग ने बताया कि चीनी की लागत बढ़ने से मिठाइयों और बेकरी उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं, जिससे ग्राहकी घटी है। छोटे कारोबारियों के लिए कच्चा माल खरीदना मुश्किल हो रहा है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने स्टॉक सीमा तय कर जमाखोरी रोकने की कोशिश की है, लेकिन जानकार कहते हैं कि जब तक नए सीजन की आवक नहीं बढ़ती, राहत मिलना कठिन है। सरकार अब चीनी मिलों को इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के रस के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने और अधिक शीरा चीनी उत्पादन के लिए छोड़ने का निर्देश दे रही है। साथ ही, आयात शुल्क में ढील देकर विदेश से चीनी मंगाने पर भी विचार चल रहा है। किसान संगठन मांग कर रहे हैं कि गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) समय पर मिले और मिलों को वित्तीय सहायता दी जाए ताकि अगले सीजन में उत्पादन बढ़ सके। निष्कर्षतः, चीनी संकट नीतिगत चूक, जलवायु अनिश्चितता और ऊर्जा नीति के टकराव का परिणाम है। तात्कालिक उपायों से कीमतों पर कुछ लगाम लग सकती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए गन्ना किसानों, चीनी मिलों और इथेनॉल कार्यक्रम के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है। सरकार को पारदर्शी भंडार निगरानी, समय पर निर्यात-आयात निर्णय और किसानों को प्रोत्साहन देकर अगले सीजन में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करनी होगी, ताकि मीठा संकट फिर न दोहराए।