सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के महासचिव अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार छात्रों के साथ वही सलूक करना चाहती है जो उसने नोएडा के मजदूरों के साथ किया था। दीपके ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सरकार लगातार छात्रों की मांगों को नजरअंदाज कर रही है और उनके आंदोलन को दबाने के लिए वही हथकंडे अपना रही है जो पहले मजदूर आंदोलनों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किए गए थे। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा छात्रों को डराने-धमकाने और उनकी आवाज को खामोश करने की है, लेकिन छात्र समुदाय इससे डरने वाला नहीं है। सीजेपी ने सरकार के रवैये के विरोध में 5 सितंबर को इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक एक विशाल मार्च निकालने की घोषणा की है। संगठन का कहना है कि सरकार ने बार-बार आश्वासन दिए लेकिन उन पर अमल नहीं किया, जिसे वे "देरी के खेल" की संज्ञा देते हैं। सीजेपी के अनुसार, उन्होंने सरकार को अपनी मांगों पर कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय दिया, लेकिन सरकार केवल आश्वासनों तक सीमित रही। अब संगठन ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और 5 सितंबर का मार्च इसी दिशा में एक निर्णायक कदम होगा। आज सीजेपी की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें केंद्र सरकार के आश्वासनों की स्थिति की समीक्षा की गई। बैठक में तय किया गया कि अगर सरकार तत्काल ठोस कदम नहीं उठाती तो नए आंदोलन का विकल्प खुला रखा जाएगा। संगठन के नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे सरकार के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन यह बातचीत सार्थक और समयबद्ध होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा तथा इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार की होगी। इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों की भी नजर है। विपक्षी दलों ने सीजेपी के मार्च को समर्थन देने के संकेत दिए हैं, वहीं सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों ने भी सीजेपी के आह्वान का स्वागत किया है और बड़ी संख्या में 5 सितंबर के मार्च में शामिल होने की बात कही है। माना जा रहा है कि यह मार्च छात्र अधिकारों और लोकतांत्रिक आवाज की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। निष्कर्षतः, सीजेपी का यह कदम सरकार और छात्र समुदाय के बीच बढ़ते टकराव को दर्शाता है। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों की जायज मांगों पर गंभीरता से विचार करे और बातचीत के जरिए समाधान निकाले। टकराव का रास्ता किसी के हित में नहीं है। 5 सितंबर का मार्च न केवल छात्रों की एकता का प्रतीक होगा, बल्कि यह लोकतंत्र में संवाद और विरोध के अधिकार की भी परीक्षा होगी। उम्मीद है कि सरकार समय रहते चेतेगी और स्थिति को और बिगड़ने से रोकेगी।