कनाडा और अमेरिका के बीच चल रहा व्यापार विवाद अब एक नए चरण में पहुँच गया है जब कनाडा ने अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की। यह कदम दोनों देशों के बीच महीनों से चल रही व्यापार वार्ताओं के विफल होने के बाद उठाया गया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने स्पष्ट किया कि उनके देश के हितों की रक्षा के लिए यह आवश्यक कदम है, क्योंकि अमेरिका ने कनाडाई इस्पात और एल्युमीनियम पर लगाए गए शुल्कों को वापस लेने से इनकार कर दिया था। इस निर्णय से दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों में तनाव और गहरा गया है। व्यापार वार्ताओं के टूटने का मुख्य कारण कनाडा की ओर से ट्रक शुल्कों में राहत की माँग थी, जिसे अमेरिकी प्रशासन ने स्वीकार करने से मना कर दिया। सूत्रों के अनुसार, कनाडा चाहता था कि अमेरिका अपने बाजार में कनाडाई ट्रकों और वाहनों की पहुँच सुगम बनाए, लेकिन ट्रम्प प्रशासन ने इसे अपनी घरेलू ऑटो उद्योग के लिए खतरा माना। इस असहमति के कारण वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई, जिसके तुरंत बाद कनाडा ने अमेरिकी कृषि उत्पादों, इस्पात, एल्युमीनियम और उपभोक्ता वस्तुओं पर 25 प्रतिशत तक के जवाबी शुल्क लागू कर दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "कनाडा राज्य के लाभ चाहता है बिना राज्य बने"। उनकी इस टिप्पणी से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और बढ़ गया है। ट्रम्प ने यह भी संकेत दिए कि यदि कनाडा अपने शुल्क वापस नहीं लेता तो अमेरिका कनाडाई ऑटोमोबाइल निर्यात पर भारी शुल्क लगा सकता है, जो कनाडा की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते (नाफ्टा) के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा रहा है। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी के लिए यह स्थिति एक बड़ी परीक्षा है, क्योंकि उन्हें घरेलू राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच संतुलन बनाना होगा। विपक्षी दल उन पर अमेरिका के सामने झुकने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि उद्योग जगत चाहता है कि विवाद जल्द सुलझे ताकि निर्यात प्रभावित न हो। कार्नी सरकार ने स्पष्ट किया है कि वे विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भी अमेरिका के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगे, जिससे यह विवाद बहुपक्षीय मंच पर भी पहुँच गया है। निष्कर्ष के रूप में, यह व्यापार युद्ध दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए हानिकारक साबित हो सकता है, क्योंकि दोनों एक-दूसरे के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वार्ता की मेज पर लौटकर ही इस गतिरोध को तोड़ा जा सकता है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी और उपभोक्ताओं को महंगाई का सामना करना पड़ेगा। अब सबकी नजरें अगले कुछ हफ्तों में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों पर टिकी हैं, जहाँ कोई समाधान निकलने की उम्मीद है।