भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) की महासभा की बैठक में अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के पद से इस्तीफे की मांग ने तूल पकड़ लिया है। सह-अध्यक्ष ने गंभीर आरोप लगाते हुए मिश्रा को 15 दिन के भीतर पद छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है। यह घटनाक्रम विधिक बिरादरी में हलचल पैदा कर रहा है क्योंकि मिश्रा लंबे समय से बीसीआई का नेतृत्व कर रहे हैं और उन पर वित्तीय अनियमितताओं तथा प्रशासनिक खामियों के आरोप लगे हैं। बैठक के दौरान सह-अध्यक्ष ने आठ विशिष्ट आरोपों का जिक्र किया जिनमें वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी, नियुक्तियों में पक्षपात, और नालसार विश्वविद्यालय के कुलपति चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। सह-अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि मिश्रा निर्धारित अवधि में इस्तीफा नहीं देते तो उनके खिलाफ संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू की जाएगी। इस मांग को महासभा के कई सदस्यों का समर्थन मिलने की खबर है। इस बीच उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर मिश्रा के कार्यकाल को चुनौती दी गई है और बीसीआई के वित्तीय लेखा-जोखा के स्वतंत्र ऑडिट की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मिश्रा के नेतृत्व में परिषद की स्वायत्तता और पारदर्शिता प्रभावित हुई है। नालसार विवाद ने इस आग में घी का काम किया है जहां कुलपति चयन प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप को लेकर विधिक शिक्षाविदों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। मनन कुमार मिश्रा ने अब तक इन आरोपों को खारिज करते हुए पद पर बने रहने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और उनके कार्यकाल में बीसीआई ने विधिक शिक्षा और वकीलों के कल्याण के लिए उल्लेखनीय कार्य किए हैं। हालांकि बढ़ते दबाव और न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना को देखते हुए उनके लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। इस पूरे प्रकरण का असर भारतीय विधिक व्यवस्था की सर्वोच्च नियामक संस्था की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है। विधिक बिरादरी की निगाहें अब बीसीआई की आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या मिश्रा स्वेच्छा से पद छोड़ते हैं या संवैधानिक प्रक्रिया के तहत उन्हें हटाया जाता है। इस घटनाक्रम ने विधिक संस्थानों में जवाबदेही और सुशासन की आवश्यकता को फिर से रेखांकित किया है।