केंद्र सरकार ने चीनी की बढ़ती कीमतों पर बड़ा बयान देते हुए स्पष्ट किया है कि इसके पीछे एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन में कमी और आगामी त्योहारी सीजन की भारी मांग मुख्य कारण हैं। खाद्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, चालू सीजन में गन्ने की पैदावार उम्मीद से कम रही है, जिससे चीनी का कुल उत्पादन अनुमानित लक्ष्य से पीछे रह गया है। इस बीच, दीवाली और अन्य त्योहारों से पहले थोक और खुदरा बाजार में मांग अचानक बढ़ गई है, जिससे कीमतों पर दबाव बना हुआ है। सरकार ने उन अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने (E20) की नीति के कारण गन्ने का बड़ा हिस्सा डिस्टिलरीज की ओर चला गया है, जिससे चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि एथेनॉल कार्यक्रम पूरी तरह से अधिशेष गन्ने और चीनी पर आधारित है और इससे खाद्य सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा, केंद्र ने जमाखोरी की आशंका को देखते हुए राज्य सरकारों को सख्त निगरानी के निर्देश दिए हैं और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक सीमा लगाने पर भी विचार किया जा रहा है। एक दशक में पहली बार भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है, जो घरेलू आपूर्ति की तंगी को दर्शाता है। व्यापारिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने कच्ची चीनी के आयात पर शुल्क में छूट देकर विदेशी खरीद का रास्ता खोला है, ताकि घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सके। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में सूखे और असामान्य बारिश के कारण गन्ने की फसल प्रभावित हुई है, जबकि उत्तर प्रदेश में उत्पादन लगभग स्थिर रहा है। इस पृष्ठभूमि में, खुदरा बाजार में चीनी 44-46 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है, जो पिछले साल की तुलना में 15-20 प्रतिशत अधिक है। उपभोक्ता मामलों के विभाग ने राज्यों से कहा है कि वे थोक विक्रेताओं और बड़े खुदरा विक्रेताओं के स्टॉक की साप्ताहिक जांच करें और कालाबाजारी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। साथ ही, सरकार ने चीनी मिलों को निर्देश दिया है कि वे अपनी मासिक बिक्री कोटा का पालन करें और बाजार में नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि नए सीजन की गन्ना पेराई अक्टूबर-नवंबर से शुरू होने के बाद आपूर्ति में सुधार आएगा, लेकिन तब तक त्योहारी मांग बनी रहने से कीमतें ऊंचे स्तर पर रह सकती हैं। निष्कर्ष के तौर पर, केंद्र की स्पष्टीकरण से यह साफ होता है कि चीनी मूल्य वृद्धि एक अस्थायी आपूर्ति-मांग असंतुलन का परिणाम है, न कि दीर्घकालिक नीतिगत विफलता का। सरकार की सक्रिय निगरानी, आयात सुविधा और जमाखोरी विरोधी उपायों से आने वाले महीनों में स्थिति नियंत्रण में आने की उम्मीद है। उपभोक्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे घबराहट में खरीदारी न करें, क्योंकि सरकार पर्याप्त भंडार और सुचारू वितरण सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।