राजस्थान के एक सुदूर गांव में उस समय तनाव व्याप्त हो गया जब नागरिक अधिकार संगठन 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) की एक टीम सरकारी स्कूल के निरीक्षण के लिए पहुंची। टीम का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत जानना था, विशेषकर उस स्कूल की स्थिति देखना जो कथित तौर पर भैंस के तबेले में संचालित हो रहा था। लेकिन जैसे ही टीम गांव में दाखिल हुई, बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ धक्का-मुक्की शुरू कर दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि टीम के सदस्यों को जान बचाकर भागना पड़ा और ग्रामीणों ने उन्हें काफी दूर तक खदेड़ा। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि भीड़ किस कदर उग्र थी। सीजेपी की सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की सहयोगी डिपके ने आरोप लगाया है कि पुलिस मूकदर्शक बनी रही और हमलावरों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि यह पूर्व नियोजित हमला था, जिसमें स्थानीय भाजपा नेताओं का हाथ है। घटना के बाद सीजेपी ने बयान जारी कर कहा कि वे केवल संवैधानिक अधिकार के तहत स्कूल की स्थिति देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें बर्बरता का शिकार होना पड़ा। टीम के सदस्यों ने बताया कि ग्रामीणों के हाथों में लाठियां थीं और वे लगातार धमकियां दे रहे थे। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नागरिक समाज संगठन अब सरकारी संस्थाओं की निगरानी भी नहीं कर सकते? इस घटना पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर भाजपा पर तीखा हमला बोला और पूछा कि 'आखिर देश में चल क्या रहा है?' उन्होंने कहा कि अगर कोई संस्था स्कूलों की हालत देखना चाहती है तो उस पर हमला करवाना लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। वहीं, राजस्थान सरकार के एक मंत्री ने बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए सीजेपी कार्यकर्ताओं को 'कॉकरोच' जैसा बताकर उनकी तुलना तुच्छ कीड़े से कर दी। इस बयान की चौतरफा निंदा हो रही है और इसे सत्ता के अहंकार का प्रतीक बताया जा रहा है। भाजपा ने हालांकि इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ग्रामीणों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया करार दिया है। पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, घटनास्थल पर पुलिसकर्मी मौजूद थे लेकिन उन्होंने भीड़ को नियंत्रित करने के बजाय चुप्पी साधे रखी। डिपके ने पुलिस को 'मूकदर्शक' बताते हुए कहा कि अगर पुलिस चाहती तो घटना को रोका जा सकता था। इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, जिससे पीड़ित पक्ष में रोष है। मानवाधिकार संगठनों ने मामले की न्यायिक जांच की मांग की है। कुल मिलाकर, राजस्थान की यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे सत्ताधारी दल के इशारे पर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। स्कूल जैसी बुनियादी संस्था की बदहाली छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लेना किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंताजनक है। अब देखना होगा कि प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी राजनीतिक रस्साकशी की भेंट चढ़ जाता है।