📰 Kotputli News
Breaking News: मंत्रियों-अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें, अभिजीत दीपके की चुनौती: 'अपने काम पर भरोसा नहीं?'
🕒 2 weeks ago

सामाजिक कार्यकर्ता और सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त दोहरे मापदंड पर करारा प्रहार करते हुए एक बड़ी मांग उठाई है। उन्होंने कहा है कि शिक्षा मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और नीति निर्माताओं के बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला अनिवार्य किया जाना चाहिए। दीपके ने सवालिया लहजे में पूछा कि जब ये लोग अपनी ही बनाई व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते और अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं, तो आम जनता उस व्यवस्था पर विश्वास कैसे करेगी? उनकी इस मुहिम ने एक बार फिर सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की बदहाली और जिम्मेदारों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। अभिजीत दीपके लंबे समय से 'स्कूल ठीक करो' अभियान चला रहे हैं, जिसका उद्देश्य ग्रामीण और शहरी सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की उपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित कराना है। हाल ही में उनके प्रयासों से उनके पैतृक गांव के स्कूल को पहला कंप्यूटर मिलना इस अभियान की एक ठोस उपलब्धि है। दीपके का तर्क है कि शिक्षा व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग जब तक जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होंगे, तब तक नीतियां कागजों तक ही सीमित रहेंगी। उन्होंने इसे 'कॉकरोच मूवमेंट' की संज्ञा देते हुए कहा कि जैसे कॉकरोच अंधेरे में छिपे रहते हैं, वैसे ही व्यवस्था की खामियों को नजरअंदाज किया जाता है, लेकिन अब स्कूलों को अगला मोर्चा बनाकर इस अंधेरे को चीरना होगा। देश के प्रमुख समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। द हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, टेलीग्राफ इंडिया और अल जजीरा जैसे संस्थानों ने दीपके के इस साहसिक कदम और उनके तर्कों को विस्तार से प्रकाशित किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दीपके ने इसे एक 'डेयर' (चुनौती) के रूप में पेश करते हुए पूछा है कि आखिर शिक्षा मंत्री और अधिकारी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में क्यों भेजते हैं? क्या उन्हें अपनी ही नीतियों, पाठ्यक्रम और सरकारी स्कूलों के माहौल पर भरोसा नहीं है? इस सवाल ने नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों में असहजता पैदा कर दी है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दीपके की यह मांग कोई नई नहीं है, लेकिन इसे जिस मुखरता और साक्ष्य-आधारित अभियान के साथ उठाया गया है, वह नया है। कई राज्यों में पूर्व में ऐसे प्रयास हुए हैं, लेकिन वे इच्छाशक्ति के अभाव में दम तोड़ गए। यदि नीति निर्माताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे, तो स्कूलों में शौचालय, पेयजल, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और योग्य शिक्षकों की कमी अपने आप दूर होने लगेगी। यह कदम 'सबके लिए समान शिक्षा' के संवैधानिक सपने को साकार करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अभिजीत दीपके की यह आवाज महज एक मांग नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने का एक सशक्त प्रयास है। जब तक शिक्षा के मंदिरों को सुविधा संपन्न और गरिमामय नहीं बनाया जाता, तब तक देश का भविष्य कहे जाने वाले नौनिहालों के साथ अन्याय जारी रहेगा। सरकार और समाज को इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि सरकारी स्कूल 'मजबूरी का विकल्प' न रहकर 'पहली पसंद' बन सकें। यही लोकतंत्र में समानता और न्याय की असली कसौटी है।

Stay connected with Kotputli News for latest updates.


📲 Share on WhatsApp
✍️ By Pradeep Yadav | 18 Aug 2026