अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए नए रक्षा समझौते का खुलकर स्वागत करते हुए इसे 'बड़ा, साहसिक और महत्वपूर्ण पहला कदम' करार दिया है। इस त्रिपक्षीय समझौते को 'मक्का संयुक्त प्रतिरोध समझौता' नाम दिया गया है, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना को नया आकार देना है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर जारी बयान में कहा कि यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक लड़ाई में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने तीनों मुस्लिम बहुल देशों की एकजुटता को ऐतिहासिक बताते हुए उम्मीद जताई कि इससे शांति और समृद्धि के नए द्वार खुलेंगे। इस रक्षा समझौते के तहत तीनों देश खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करने, रक्षा प्रौद्योगिकी के संयुक्त विकास और आतंकवाद विरोधी अभियानों में समन्वय बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता एक तरह से 'इस्लामिक नाटो' की नींव रखता है, जो क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव और गैर-राज्य अभिकर्ताओं द्वारा पैदा किए जा रहे खतरों का मुकाबला करने के लिए एक सामूहिक सुरक्षा ढांचा प्रदान करेगा। भारत के लिए इस विकास के गहरे सामरिक निहितार्थ हैं। कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान को दो प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों - सऊदी अरब और तुर्की - का खुला सैन्य समर्थन मिलने से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। खासकर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को इन देशों का राजनयिक समर्थन और मजबूत हो सकता है। हालांकि, भारत के सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के साथ गहरे ऊर्जा, व्यापार और निवेश संबंध हैं, जो इस नए गठजोड़ के प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं। भारत सरकार इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है और अपनी विदेश नीति के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। अमेरिकी समर्थन के साथ आया यह समझौता पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करता है। जहां एक ओर यह सुन्नी मुस्लिम देशों की एकता को प्रदर्शित करता है, वहीं दूसरी ओर यह क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले महीनों में इस गठजोड़ की व्यावहारिक प्रगति और इसके जमीनी क्रियान्वयन पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। भारत को अपनी 'पड़ोसी पहले' और 'विस्तारित पड़ोस' की नीति के तहत खाड़ी देशों के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ करते हुए, इस बदलते परिदृश्य में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय कूटनीति अपनानी होगी।