उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पूर्व मंत्री पिन्नेली रामकृष्ण रेड्डी को बड़ी कानूनी राहत प्रदान करते हुए अमरावती भूमि पूलिंग योजना से जुड़े कथित अनियमितता के मामले में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने के उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में दायर विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया आरोपियों के विरुद्ध कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। इस निर्णय से नायडू सरकार को न केवल कानूनी मोर्चे पर बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण विजय हासिल हुई है। मामले की पृष्ठभूमि में अमरावती राजधानी क्षेत्र के विकास के लिए भूमि पूलिंग योजना के क्रियान्वयन में कथित भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप शामिल थे। पूर्ववर्ती वाईएसआर कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सतर्कता विभाग द्वारा इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें मुख्यमंत्री नायडू, तत्कालीन नगर प्रशासन मंत्री पिन्नेली रामकृष्ण रेड्डी और कई वरिष्ठ अधिकारियों को आरोपी बनाया गया था। आरोप था कि योजना के तहत भूमि अधिग्रहण और पुनर्वितरण में नियमों की अनदेखी कर कुछ चुनिंदा व्यक्तियों और कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। हालांकि, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने गत वर्ष इस प्राथमिकी को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि जांच एजेंसी आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त सामग्री जुटाने में विल रही है। उच्च न्यायालय के इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने पाया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और अनुमान पर आधारित हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि नीतिगत निर्णय लेने की प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप तभी उचित है जब दुर्भावना या भ्रष्टाचार के ठोस साक्ष्य मौजूद हों। वर्तमान प्रकरण में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका जो लोक सेवकों के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति दे। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा के दायरे सीमित हैं और केवल असंतोष के आधार पर आपराधिक कार्यवाही आरंभ नहीं की जा सकती। इस फैसले का स्वागत करते हुए तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) ने इसे सत्य और न्याय की जीत करार दिया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से झूठे मामले दर्ज कराए गए थे। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय लोक सेवकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों को नीतिगत फैसलों के लिए अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। यह फैसला प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में विश्वास बहाली की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। निष्कर्षतः, उच्चतम न्यायालय का यह आदेश अमरावती भूमि प्रकरण में लंबे समय से चल रहे कानूनी गतिरोध पर विराम लगाता है। यह निर्णय न केवल मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उनके सहयोगियों के लिए व्यक्तिगत राहत का विषय है, बल्कि यह शासन व्यवस्था में नीतिगत निर्णयों की पवित्रता और न्यायिक मर्यादा को भी रेखांकित करता है। अब राज्य सरकार बिना किसी कानूनी अड़चन के राजधानी क्षेत्र के विकास कार्यों को गति दे सकेगी, जिससे प्रदेश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।