उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु के करूर जिले में हुए भीषण भगदड़ हादसे के पीड़ितों के परिवार वालों को अनुकंपा नियुक्ति देने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द करने वाले मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी है। इस निर्णय से हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से न्याय और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे थे। शीर्ष अदालत की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर सरकार पीड़ित परिवारों को रोजगार क्यों नहीं दे सकती, जब यह उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा मामला है। मामला करूर के एक प्रसिद्ध मंदिर में वार्षिक उत्सव के दौरान मची भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें कई श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। तमिलनाडु सरकार ने पीड़ित परिवारों के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का आदेश जारी किया था, लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय ने इस आदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार केवल सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों तक सीमित है, आम नागरिकों के लिए नहीं। उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार और पीड़ित परिवारों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने टिप्पणी की कि जब राज्य सरकार खुद पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आई है, तो न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। पीठ ने कहा कि ऐसी त्रासदी में जिन परिवारों ने अपने कमाऊ सदस्य खो दिए, उनकी आजीविका सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप एक मानवीय पहल है। तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि सरकार का फैसला जनहित और सामाजिक न्याय की भावना से प्रेरित था। वहीं, पीड़ित परिवारों के वकीलों ने उच्च न्यायालय के फैसले को असंवेदनशील बताते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी पक्षों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। इस फैसले का स्वागत करते हुए पीड़ित परिवारों ने राहत की सांस ली है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और कानूनविदों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के रुख को मानवीय और संवेदनशील बताया है। अब सबकी नजरें अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो न केवल करूर के पीड़ितों बल्कि देशभर में ऐसी त्रासदियों के शिकार परिवारों के लिए नजीर बनेगा। न्यायालय का यह कदम यह स्पष्ट करता है कि संकट की घड़ी में राज्य की जिम्मेदारी केवल मुवजे तक सीमित नहीं, बल्कि पीड़ितों के भविष्य को सुरक्षित करने तक जाती है।