संसद ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक पारित कर राज्यों की खनिजों पर कर लगाने और पुराने बकाया वसूलने की शक्तियों पर बड़ी रोक लगा दी है। इस नए कानून के तहत अब राज्य खनिजों पर मनमाना कर या उपकर नहीं लगा सकेंगे, साथ ही पूर्व प्रभाव से बकाया वसूली पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे खनन क्षेत्र में एकरूपता आएगी, निवेश बढ़ेगा और विवादों में कमी होगी। लेकिन विक्षी दलों और खनिज संपन्न राज्यों ने इसे संघीय ढांचे पर प्रहार बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में खनिजों पर कर लगाने का अधिकार केंद्र को देना, राज्यों द्वारा पूर्व में लगाए गए करों की वसूली पर रोक, और विवाद समाधान के लिए केंद्रीय तंत्र स्थापित करना शामिल है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री मोदी से इस विधेयक पर पुनर्विचार का आग्रह करते हुए कहा कि इससे राज्य के राजस्व पर गहरा असर पड़ेगा और आदिवासी क्षेत्रों के विकास की योजनाएं प्रभावित होंगी। छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान जैसे अन्य खनिज संपन्न राज्यों ने भी इसे अपने वित्तीय अधिकारों का हनन बताया है। कानूनी विशेषज्ञों ने विधेयक के पूर्व प्रभावी प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया है। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व प्रभाव से कर वसूली पर रोक संविधान के अनुच्छेद 265 का उल्लंघन हो सकती है, जो कराधान के लिए कानूनी प्राधिकार को अनिवार्य बनाता है। वहीं, केरल में मछुआरों ने काले रेत के खनन को कॉरपोरेट घरानों के लिए खोलने के कदम का विरोध करते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि इससे तटीय पर्यावरण और उनकी आजीविका नष्ट हो जाएगी। टेलीग्राफ इंडिया के अनुसार, राज्यों का तर्क है कि खनिज उनके भूक्षेत्र में हैं और उन पर कर लगाना उनका संवैधानिक अधिकार है। केंद्र का यह कदम सहकारी संघवाद की भावना के विरीत है। लाइव लॉ ने संसदीय बहस का हवाला देते हुए बताया कि विक्ष ने विधेयक को संसदीय समिति को भेजने की मांग की थी, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया। निष्कर्षतः, यह विधेयक खनन क्षेत्र में सुार की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके संघीय ढांचे, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में इस कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की प्रबल संभावना है। केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और सहमति से ही खनिज संपदा का न्यायसंगत दोहन और राजस्व बंटवारा संभव हो सकेगा।