संसद का मानसून सत्र शुक्रवार को समाप्त हो गया। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस सत्र को 'विधायी कारोबार की दृष्टि से बहुत सफल' बताते हुए कहा कि इस दौरान कुल 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए गए। हालांकि, सत्र के दौरान विपक्ष के लगातार हंगामे और व्यवधान के कारण राज्यसभा की उत्पादकता मात्र 39 प्रतिशत रही, जिस पर सभापति ने गहरा खेद व्यक्त किया। सत्र के अंतिम दिन दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति बनी रही, जिससे कई अहम मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी। राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सत्र समाप्ति की घोषणा करते हुए सदन में बार-बार हुए व्यवधान पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी दलों का सहयोग आवश्यक है, लेकिन विपक्ष के रवैये के कारण जनता के मुद्दों पर चर्चा प्रभावित हुई। वहीं, लोकसभा में भी कई दिनों तक हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। रिजिजू ने विपक्ष विशेषकर कांग्रेस पर जानबूझकर व्यवधान पैदा करने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार थी, लेकिन विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। दूसरी ओर, विपक्ष ने सरकार पर संसद से भागने और जवाबदेही से बचने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि भाजपा नेतृत्व विपक्ष के सवालों का सामना करने से डरता था, इसलिए सदन में उपस्थिति कम रही। डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, छात्र आंदोलन के दबाव में विपक्ष ने सरकार को कई मुद्दों पर बैकफुट पर धकेल दिया। विपक्ष ने पेपर लीक, महंगाई, बेरोजगारी और मणिपुर हिंसा जैसे ज्वलंत मुद्दों पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किया। सत्र के दौरान पारित प्रमुख विधेयकों में भ्रूण हत्या रोकथाम संशोधन विधेयक, तटीय जलकृषि प्राधिकरण संशोधन विधेयक, और विभिन्न विनियोग विधेयक शामिल हैं। सरकार का दावा है कि ये विधेयक जनहित में महत्वपूर्ण सुधार लाएंगे। हालांकि, कई विधेयकों को बिना पर्याप्त चर्चा के पारित कराने पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सरकार विपक्ष की रचनात्मक आलोचना का स्वागत करती है, लेकिन व्यवधान की राजनीति देशहित में नहीं है। निष्कर्ष के तौर पर, मानसून सत्र विधायी उपलब्धियों के बावजूद संसदीय मर्यादा और संवाद की कमी के लिए याद रखा जाएगा। दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच जनता के वास्तविक मुद्दे हाशिये पर रहे। आगामी शीतकालीन सत्र में यह देखना होगा कि क्या सरकार और विपक्ष गतिरोध तोड़कर संसद को सुचारू रूप से चला पाते हैं या फिर टकराव का सिलसिला जारी रहता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए संसद में सार्थक संवाद और सहमति अनिवार्य है।