कावेरी जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक में बुलाए गए बंद का असर धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है। कर्नाटक रक्षणा वेदिके (केआरवी) के विभिन्न गुटों द्वारा समर्थन वापस लेने और कर्नाटक एसोसिएशन ऑफ मैनेजमेंट ऑफ स्कूल्स (कैम्स) द्वारा स्कूल बंद रखने का आह्वान वापस लेने के बाद जनजीवन लगभग सामान्य रहने की उम्मीद है। बेंगलुरु पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि किसी को भी बंद में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जबकि अधिकांश संगठनों ने केवल नैतिक समर्थन देने की बात कही है। कावेरी जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बीच कर्नाटक रक्षणा वेदिके और अन्य कन्नड़ समर्थक संगठनों ने शुक्रवार को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया था। हालांकि, बंद की पूर्व संध्या पर ही केआरवी के कई गुटों ने अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे बंद की धार कमजोर पड़ गई। कैम्स ने भी अभिभावकों और छात्रों की चिंताओं को देखते हुए स्कूल बंद रखने का अपना आह्वान वापस ले लिया, जिससे शैक्षणिक संस्थान सामान्य रूप से खुले रहेंगे। बैंकों और अस्पतालों ने भी सामान्य कामकाज जारी रखने की घोषणा की है। बेंगलुरु पुलिस आयुक्त ने बंद से पहले शांति बनाए रखने की अपील करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक या व्यापारी को बंद में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं और किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए पर्याप्त बल तैनात किया गया है। पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट किया कि जबरन दुकानें बंद करवाने या यातायात बाधित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश व्यापारिक संगठनों और व्यापारिक संघों ने बंद को केवल नैतिक समर्थन देने की घोषणा की है, जिसका अर्थ है कि वे अपनी दुकानें और प्रतिष्ठान खुले रखेंगे। द हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु के अधिकांश इलाकों में जनजीवन सामान्य रहने की उम्मीद है। द न्यूज मिनट की रिपोर्ट के अनुसार, कैम्स द्वारा स्कूल बंदी का आह्वान वापस लेने के बाद अधिकांश स्कूल सामान्य रूप से संचालित होंगे। कावेरी जल विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चला आ रहा एक संवेदनशील मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देशों के बावजूद दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर मतभेद बने हुए हैं। कर्नाटक का तर्क है कि कम बारिश के कारण उसके जलाशयों में पानी की कमी है, जबकि तमिलनाडु अपने हिस्से का पानी मांग रहा है। इस बंद से यह स्पष्ट होता है कि जनता अब बंद जैसे आंदोलनों से ऊब चुकी है और सामान्य जनजीवन प्रभावित नहीं होने देना चाहती। भविष्य में इस मुद्दे का समाधान बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही निकलने की उम्मीद है।