होरमुज जलडमरूमध्य में ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता का नया दौर शुरू हुआ है, जिसमें दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी शर्तें रखी हैं। ओमान की मध्यस्थता में चल रही इस बातचीत में ईरान ने युद्ध क्षतिपूर्ति की मांग रखी है, जबकि अमेरिका ने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त प्रतिबंधों की बात कही है। इस वार्ता को पश्चिम एशिया की सुरक्षा और वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि होरमुज जलडमरूमध्य से ही दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का परिवहन होता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की युद्ध क्षतिपूर्ति की मांग को खारिज करते हुए कहा है कि ईरान के पास दो ही विकल्प हैं: या तो वह आर्थिक रूप से विफल हो जाए, या फिर अमेरिका उस पर 'बहुत सख्त' कार्रवाई करेगा। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों पर अमेरिका का नियंत्रण है और वे उसके 'बैंकर' की तरह काम कर रहे हैं। उनके इस बयान से साफ है कि अमेरिका ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति जारी रखना चाहता है। वहीं, ईरान का रुख भी सख्त बना हुआ है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी दबाव में नहीं झुकेंगे और अपने परमाणु अधिकारों की रक्षा करेंगे। ईरान ने 2015 के परमाणु समझौते (जेसीपीओए) को पुनर्जीवित करने की मांग की है, लेकिन अमेरिका की नई शर्तों ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी और घरेलू राजनीतिक दबाव किसी भी समझौते की राह में बड़ी बाधा हैं। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस वार्ता पर टिकी हैं। यूरोपीय देशों ने बातचीत जारी रखने का आग्रह किया है, जबकि इजराइल और खाड़ी के कुछ देश ईरान पर सख्त रवैये के पक्षधर हैं। तनाव बढ़ने की स्थिति में होरमुज जलडमरूमध्य में नौसैनिक टकराव का खतरा भी बना हुआ है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकते हैं। कुल मिलाकर, ईरान-अमेरिका वार्ता का यह नया चरण बेहद नाजुक मोड़ पर है। जहां एक ओर कूटनीतिक समाधान की उम्मीद बनी हुई है, वहीं दोनों पक्षों के बयानों से टकराव की आशंका भी बढ़ गई है। आने वाले दिनों में ओमान की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय दबाव ही तय करेंगे कि यह वार्ता किसी समझौते तक पहुंचती है या फिर तनाव नए संघर्ष को जन्म देता है।