संसद के मानसून सत्र 2026 का सत्रहवां दिन भी हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की कार्यवाही दोपहर दो बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्ष अपनी मांगों पर अड़ा रहा, वहीं सत्तापक्ष ने भी आक्रामक रुख अपनाया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि वे भागने के बजाय सदन में गृह मंत्री अमित शाह का सामना करें। रिजिजू का यह बयान संसद के गलियारों में चर्चा का केंद्र बना रहा। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में जारी गतिरोध पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विपक्ष शुरुआत से ही अपनी मांगों पर कायम है और सरकार उनकी जायज मांगों को अनसुना कर रही है। खड़गे ने जोर देकर कहा कि विपक्ष संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर जनहित के मुद्दे उठा रहा है, लेकिन सरकार चर्चा से भाग रही है। इस बीच, एक प्रमुख प्रकाशन में छपे लेख में गृह मंत्री की पुलिस बर्बरता पर चुप्पी को संवैधानिक नैतिकता के साथ विश्वासघात बताया गया है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ गई है। हंगामे के बीच लोकसभा ने एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया, जिसमें केरल राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' करने का प्रावधान है। यह विधेयक लंबे समय से केरल की जनता और वहां की सरकार की मांग थी। सदन में इस विधेयक पर संक्षिप्त चर्चा के बाद इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। हालांकि, विपक्ष ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक को बिना विस्तृत चर्चा के पारित करना संसदीय परंपराओं के विपरीत है। सत्र के दौरान विपक्ष मणिपुर हिंसा, महंगाई, बेरोजगारी और केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री के बयान और विस्तृत चर्चा की मांग कर रहा है। वहीं सरकार का कहना है कि वह हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष सदन चलने नहीं दे रहा है। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच संसदीय कार्यवाही लगातार बाधित हो रही है और जनहित के कई महत्वपूर्ण विधेयक लंबित पड़े हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र का यह गतिरोध आने वाले दिनों में और गहरा सकता है। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं और बीच का रास्ता निकलता नहीं दिख रहा। संसद की गरिमा और जनता के प्रति जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करना अब दोनों पक्षों की सबसे बड़ी चुनौती है। देश की जनता उम्मीद कर रही है कि उनके प्रतिनिधि संवाद और सहमति के रास्ते निकालकर सदन को सुचारू रूप से चलाएंगे।