कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रयागराज में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में युवाओं से सीधा संवाद करते हुए देश की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार संकट पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज भारत में डिग्री का कोई मूल्य नहीं रह गया है, क्योंकि युवा डिग्री लेकर भी बेरोजगार घूम रहे हैं। राहुल ने अपने संबोधन में तीन प्रमुख शब्दों 'दर्द', 'डेटा' और 'दौलत' के माध्यम से युवाओं की पीड़ा, सरकारी आंकड़ों की हकीकत और चंद हाथों में केंद्रित संपत्ति की असमानता को उजागर किया। उन्होंने कहा कि युवाओं का दर्द समझने के लिए सत्ता के गलियारों से निकलकर उनके बीच आना पड़ता है। कार्यक्रम में उपस्थित सैकड़ों छात्रों की भीड़ के सामने राहुल गांधी ने बेरोजगारी को देश की सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए पूछा कि आखिर नौकरियां कहां हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था चंद उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है, जबकि मेहनती युवाओं के लिए दरवाजे बंद हैं। राहुल ने भ्रष्ट तंत्र को प्रेम और स्नेह से खत्म करने का आह्वान करते हुए कहा कि नफरत से नहीं, बल्कि मोहब्बत से ही इस व्यवस्था को बदला जा सकता है। उन्होंने भारत के युवाओं में 'अद्वितीय क्षमता' होने की बात कही और दावा किया कि अगर उन्हें सही अवसर मिले तो वे दुनिया बदल सकते हैं। इस दौरान राहुल ने सरकारी नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि डेटा दिखाता है कि बेरोजगारी दर ऐतिहासिक ऊंचाई पर है, लेकिन सरकार इसे छिपाने में लगी है। उन्होंने पेपर लीक, भर्ती घोटाले और ठेका प्रथा जैसी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये सब युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। कांग्रेस नेता ने छात्रों से अपील की कि वे डरें नहीं, अपनी आवाज बुलंद करें और लोकतांत्रिक तरीके से अपने हक की लड़ाई लड़ें। उन्होंने वादा किया कि उनकी पार्टी युवाओं के मुद्दों को संसद से सड़क तक मजबूती से उठाती रहेगी। हालांकि, इस कार्यक्रम पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी को प्रयागराज के बजाय रांची जाना चाहिए था, जहां आदिवासी युवाओं की समस्याएं अधिक गंभीर हैं। भाजपा ने इसे चुनावी स्टंट करार दिया, जबकि कांग्रेस ने इसे युवाओं की आवाज बुलंद करने का वास्तविक प्रयास बताया। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच, कार्यक्रम में मौजूद छात्रों का उत्साह और उनकी तालियां यह दर्शा रही थीं कि बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता उनके लिए कितना बड़ा मुद्दा बन चुका है। निष्कर्षतः, 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम ने एक बार फिर युवा आक्रोश को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। राहुल गांधी का यह संवाद जहां विपक्ष की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, वहीं यह सत्ताधारी दल के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि युवाओं की उपेक्षा अब और नहीं सहन की जाएगी। आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी राजनीति को कितना प्रभावित करेगा, यह देखना शेष है, लेकिन इतना तय है कि देश का युवा अब सवाल पूछना जान गया है और जवाब मांगना उसका हक है।