सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्कीये ने जेद्दा में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे 'मक्का संधि' नाम दिया गया है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में गाजा युद्ध और ईरान-इजरायल तनाव के कारण क्षेत्रीय अस्थिरता चरम पर है। तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में हुए इस करार को सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह मुस्लिम दुनिया की तीन प्रमुख सैन्य ताकतों को एक साझा सुरक्षा ढांचे के तहत लाता है। इस समझौते के तहत तीनों देशों ने 'एक पर हमला, तीनों पर हमला' सिद्धांत को अपनाते हुए पारस्परिक रक्षा प्रतिबद्धता जताई है। तुर्कीये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की त्रिपक्षीय बैठक के बाद इस संधि की घोषणा की गई। समझौते में संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करना, रक्षा उद्योग में सहयोग और संकट की स्थिति में त्वरित सैन्य सहायता के प्रावधान शामिल हैं। पाकिस्तान की परमाणु क्षमता, तुर्कीये की उन्नत ड्रोन तकनीक और सऊदी अरब के वित्तीय संसाधन इस गठजोड़ को एक दुर्जेय शक्ति बनाते हैं। क्षेत्रीय उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में यह समझौता विशेष मायने रखता है। गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई, लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले और ईरान के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। एर्दोगन की जेद्दा यात्रा और इस त्रिपक्षीय बैठक को तुर्कीये और सऊदी अरब के संबंधों में आई गर्मजोशी के रूप में भी देखा जा रहा है, जो कुछ वर्ष पहले तक खशोगी प्रकरण के कारण तनावपूर्ण थे। पाकिस्तान के लिए यह समझौता उसकी रणनीतिक प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित करता है और उसे खाड़ी के सुरक्षा ढांचे में केंद्रीय भूमिका प्रदान करता है। भारत ने इस विकास पर सतर्क प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली इस गठजोड़ को दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा गतिशीलता को प्रभावित करने वाला मान रही है। पाकिस्तान को मिलने वाली उन्नत सैन्य तकनीक और त्रिपक्षीय सुरक्षा छत्र भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है, विशेषकर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख को देखते हुए। हालांकि, तीनों देशों ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सामूहिक सुरक्षा के लिए है। निष्कर्षतः, 'मक्का संधि' मुस्लिम दुनिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक नए अध्याय का सूत्रपात करती है। यह समझौता न केवल तीनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है। आने वाले दिनों में संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा औद्योगिक सहयोग की रूपरेखा इस गठजोड़ की व्यावहारिकता का परीक्षण करेगी। फिलहाल, यह त्रिपक्षीय पहल अनिश्चितता भरे क्षेत्रीय माहौल में सामूहिक सुरक्षा की एक मजबूत पहल के रूप में उभरी है।