अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मंगलवार को उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की योजनाओं को लेकर बनी अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान और ओमान के बीच इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को 60 दिनों के लिए फिर से खोलने पर सहमति की खबरों के बावजूद, बाजार विश्लेषक अमेरिका और ईरान के बीच जारी गतिरोध को लेकर सशंकित हैं। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों ही प्रमुख बेंचमार्क में डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर वृद्धि देखी गई, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ने की आशंका प्रबल हो गई है। हालिया घटनाक्रम में ईरान के अधिकारियों ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का समझौता निकट है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका को अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना होगा तभी यह मार्ग पूरी तरह से खुल सकेगा। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि युद्ध 'ज्यादा लंबा नहीं चल सकता', जिससे कूटनीतिक समाधान की उम्मीद जगी है। हालांकि, ओमान की मध्यस्थता में चल रही वार्ता की जटिलताएं और दोनों पक्षों की कठोर शर्तें तेल व्यापारियों को सतर्क रखे हुए हैं। यह जलडमरूमध्य विश्व के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा पार करता है, इसलिए यहां किसी भी व्यवधान का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, तेल की कीमतों में यह तेजी आपूर्ति बाधित होने के डर से नहीं, बल्कि समझौते की शर्तों और उसके क्रियान्वयन में आने वाली संभावित अड़चनों को लेकर है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समझौता टिकाऊ साबित नहीं हुआ या किसी पक्ष ने वादाखिलाफी की तो तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है। भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि कच्चे तेल की महंगाई सीधे तौर पर घरेलू मुद्रास्फीति, चालू खाते के घाटे और रुपये की विनिमय दर को प्रभावित करती है। ईरान, अमेरिका और ओमान, तीनों पक्ष इस समझौते से अलग-अलग हित साधना चाहते हैं। ईरान प्रतिबंधों में ढील और तेल निर्यात की सुगमता चाहता है, अमेरिका क्षेत्रीय सुरक्षा और अपने सहयोगियों के हितों की गारंटी चाहता है, जबकि ओमान क्षेत्रीय स्थिरता और अपनी मध्यस्थ की भूमिका को मजबूत करना चाहता है। इस त्रिपक्षीय खींचतान में समझौते का भविष्य अधर में लटका हुआ है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बिना ठोस गारंटी के वह जलडमरूमध्य की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करेगा। निष्कर्षतः, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी सहमति फिलहाल तेल बाजार को अस्थायी राहत दे सकती है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सभी पक्षों का प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरना अनिवार्य है। भारत सहित तमाम आयातक देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति की समीक्षा करते रहना होगा और वैकल्पिक स्रोतों तथा रणनीतिक भंडारण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि यह महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा निर्बाध और सुरक्षित बना रहे।