केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में एक अहम हलफनामा दाखिल कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में आय-आधारित 'क्रीमी लेयर' लागू करने का पुरजोर विरोध किया है। सरकार ने शीर्ष अदालत को स्पष्ट शब्दों में बताया है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अधिसूचित इन वर्गों के लिए 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा लागू नहीं होती है। केंद्र का यह रुख उस याचिका के जवाब में आया है जिसमें एससी-एसटी आरक्षण के दायरे से संपन्न तबके को बाहर करने की मांग की गई थी। सरकार ने दलील दी है कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, जिसे केवल आय के पैमाने से नहीं मापा जा सकता। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति बीआर गवई की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए विकसित किया गया था, न कि एससी-एसटी के लिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार के शिकार रहे हैं, जो केवल आय बढ़ने से समाप्त नहीं होता। केंद्र ने अदालत से आग्रह किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर नीति निर्माण का अधिकार संसद के पास सुरक्षित रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह नीतिगत निर्णय का विषय है, न्यायिक समीक्षा का नहीं। सरकार ने इंदिरा साहनी मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि उस निर्णय में भी एससी-एसटी के लिए क्रीमी लेयर की बात नहीं कही गई थी। इस मामले की पृष्ठभूमि में हरियाणा सरकार का वह फैसला भी शामिल है जिसमें एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का प्रयास किया गया था, जिसे पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि यदि न्यायालय इस संबंध में कोई दिशानिर्देश तय करता है तो यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण होगा। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को आज भी ग्रामीण इलाकों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। इसलिए केवल आय के आधार पर उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित करना संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षकारों की ओर से भी दलीलें पेश की गईं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आरक्षण का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए क्रीमी लेयर जरूरी है, जबकि एससी-एसटी संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे समुदाय को बांटने की साजिश करार दिया। संविधान पीठ अब इस बात पर विचार कर रही है कि क्या राज्यों को एससी-एसटी सूची में उप-वर्गीकरण का अधिकार है और क्या क्रीमी लेयर लागू किया जा सकता है। इस फैसले का देश की आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय की दिशा पर दूरगामी असर पड़ने की संभावना है। अंत में, केंद्र सरकार का यह रुख सामाजिक न्याय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें आर्थिक समृद्धि को सामाजिक पिछड़ेपन का इलाज नहीं माना गया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय चाहे जो हो, इस बहस ने एक बार फिर भारतीय समाज में जाति, वर्ग और अवसर की समानता के जटिल अंतर्संबंधों को उजागर कर दिया है। अब सबकी निगाहें संविधान पीठ के फैसले पर टिकी हैं, जो आरक्षण की भावी दिशा तय करेगा।