बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसले में वरिष्ठ पत्रकार और तहलका पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को 2013 के बलात्कार मामले में दोषी ठहराते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को पलट दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे की एकल पीठ ने सुनाया, जिसमें तेजपाल को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 354 (महिला की मर्यादा भंग करने के इरादे से हमला) और 341 (गलत तरीके से रोकना) के तहत दोषी पाया गया। अदालत ने सजा की मात्रा पर सुनवाई के लिए अगली तारीख तय की है, जिससे इस हाई-प्रोफाइल मामले में एक नया मोड़ आ गया है। यह मामला नवंबर 2013 का है, जब गोवा के एक फाइव-स्टार होटल की लिफ्ट में तेजपाल पर अपनी कनिष्ठ सहकर्मी के साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगा था। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि तेजपाल ने दो बार उसके साथ जबरदस्ती की। मामले ने मीडिया जगत में भूचाल ला दिया था और तेजपाल को गिरफ्तार कर लिया गया था। मई 2021 में गोवा की एक सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव और पीड़िता की गवाही में विसंगतियों का हवाला देते हुए तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई थी, जिसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में निचली अदालत के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत है। अदालत ने माना कि घटना के बाद पीड़िता के व्यवहार, उसके द्वारा लिखे गए ईमेल और सहकर्मियों को बताई गई बातें उसके आरोपों की पुष्टि करते हैं। फैसले में यह भी कहा गया कि निचली अदालत ने पीड़िता की गवाही का मूल्यांकन करते समय कानून के स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की। अदालत ने तेजपाल के इस तर्क को भी ठुकरा दिया कि यह आपसी सहमति से बना संबंध था। इस फैसले का महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। इसे कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तेजपाल के वकीलों ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। अब सबकी निगाहें सजा की मात्रा पर टिकी हैं, जो इस मामले की गंभीरता और समाज पर इसके प्रभाव को देखते हुए बेहद अहम होगी। यह फैसला एक बार फिर यह संदेश देता है कि कानून से कोई ऊपर नहीं है, चाहे वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो।