दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान खुफिया ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की बर्बर हत्या के मामले में पूर्व आम आदमी पार्टी (आप) पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला ने इस जघन्य अपराध को 'दुर्लभतम श्रेणी' में मानते हुए दोषियों पर भारी जुर्माना भी लगाया है। इस फैसले के साथ ही फरवरी 2020 में राजधानी को झकझोर देने वाले दंगों के सबसे चर्चित और वीभत्स मामलों में से एक में न्याय की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच गई है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 25 फरवरी 2020 को चांद बाग इलाके में दंगाइयों की भीड़ ने अंकित शर्मा को घेर लिया था और उन पर जानलेवा हमला किया था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर चाकू के 51 घाव पाए गए थे, जिससे इस हत्या की क्रूरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दोषियों ने एक निर्दोष नागरिक को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि वह एक विशेष समुदाय से ताल्लुक रखता था और ड्यूटी पर तैनात था। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि शव को नाले में फेंकने का कृत्य मानवता को शर्मसार करने वाला है और ऐसा अपराध समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है। इस मामले में ताहिर हुसैन के अलावा अनवर, जावेद, गुलफाम और शोएब को दोषी ठहराया गया था। अदालत ने सभी दोषियों पर 10-10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसमें से 50 प्रतिशत राशि पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में दी जाएगी। फैसले के बाद अंकित शर्मा के भाई अंकुर शर्मा ने संतोष जताते हुए कहा कि हालांकि परिवार फांसी की सजा की उम्मीद कर रहा था, लेकिन आजीवन कारावास भी एक कड़ा संदेश है। उन्होंने न्यायपालिका और दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) के प्रयासों की सराहना की, जिन्होंने तमाम दबावों और चुनौतियों के बावजूद सबूतों को मजबूती से पेश किया। ताहिर हुसैन, जो घटना के समय नेहरू विहार वार्ड से आप पार्षद थे, पर दंगाइयों को उकसाने और अपने घर की छत को हमले के लिए लॉन्चपैड के रूप में इस्तेमाल करने के गंभीर आरोप लगे थे। पुलिस ने चार्जशीट में दावा किया था कि हुसैन ने साजिश रचकर अंकित शर्मा की हत्या करवाई। इस सजा के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। जहां एक ओर इसे कानून की जीत बताया जा रहा है, वहीं विपक्षी दल इस मामले को लेकर पूर्ववर्ती सरकार पर निशाना साध रहे हैं। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दोषियों का कृत्य पूर्व नियोजित था और इसमें किसी भी प्रकार की उदारता बरतना न्याय के हित में नहीं होगा। इस ऐतिहासिक फैसले ने दिल्ली दंगों के पीड़ितों के लिए न्याय की एक नई आस जगाई है। यह सजा न केवल दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाती है, बल्कि भविष्य में सांप्रदायिक उन्माद फैलाकर निर्दोषों का खून बहाने वालों के लिए एक कड़ी चेतावनी भी है। अंकित शर्मा जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, इसकी पुष्टि इस निर्णय से होती है। अब सभी की निगाहें दंगों से जुड़े अन्य लंबित मामलों पर टिकी हैं, जहां पीड़ित परिवार इसी तरह के न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।