कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री अमित शाह की संसद से अनुपस्थिति और नागरिक समाज संगठनों पर कार्रवाई की चुप्पी को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में विपक्ष के नेता खड़गे ने सीधे सवाल दागा, "क्या किसी ने आपका मुंह सिल दिया है?" यह टिप्पणी उस वक्त आई जब विपक्ष सीजेपी (सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस) से जुड़े कार्यकर्ताओं पर हुई कार्रवाई और एनईईटी परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा था। खड़गे का आरोप है कि गृह मंत्री सदन में आकर विपक्ष के सवालों का सामना करने के बजाय अपने वातानुकूलित कक्षों में बैठे हैं। खड़गे के इस बयान पर सत्तापक्ष ने कड़ा एतराज जताया और इसे "हिंसा की धमकी" करार दिया। भाजपा नेताओं ने राज्यसभा में जोरदार हंगामा करते हुए खड़गे से माफी की मांग की। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल समेत कई भाजपा सांसदों ने कहा कि विपक्ष का नेता इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता। हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी। विपक्षी दल लगातार अमित शाह की सदन में मौजूदगी की मांग पर अड़े रहे, जिसके कारण गतिरोध बना रहा। इस बीच, खड़गे ने केंद्र सरकार पर एनईईटी विरोध प्रदर्शन और पेपर लीक रोधी कानून में संशोधन को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने पेपर लीक रोधी कानून में किए गए बदलाव को "ढकोसला" बताते हुए कहा कि यह छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया कि सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्ष और नागरिक समाज की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सीजेपी पर हुई कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया और सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। संसदीय कार्यवाही में आए इस गतिरोध ने मानसून सत्र के सुचारू संचालन पर सवालिया निशान लगा दिया है। विपक्ष जहां गृह मंत्री की जवाबदेही तय करने पर अड़ा है, वहीं सत्तापक्ष खड़गे की भाषा को मुद्दा बनाकर पलटवार कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। अंततः, संसद का यह गतिरोध लोकतंत्र में संवाद और जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है। जहां विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार है, वहीं सरकार का दायित्व है कि वह पारदर्शिता के साथ जवाब दे। व्यक्तिगत आक्षेपों से बचते हुए जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा ही संसद की गरिमा को बनाए रख सकती है। उम्मीद है कि गतिरोध जल्द टूटेगा और सदन जनता से जुड़े जरूरी मुद्दों पर चर्चा कर सकेगा।