उच्चतम न्यायालय ने देशभर में पुलिसकर्मियों पर बढ़ते हमलों और प्रदर्शनों के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायालय ने विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में पूछा कि आखिर राज्य पुलिस बल को बुनियादी सुरक्षा उपकरण जैसे हेलमेट, बॉडी प्रोटेक्टर और ढाल उपलब्ध कराने में विफल क्यों हैं। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जो पुलिसकर्मी दिन-रात कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें उचित सुरक्षा कवच मुहैया कराना राज्य का संवैधानिक दायित्व है, न कि कोई एहसान। न्यायालय ने दिल्ली समेत कई राज्यों में हालिया प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज और बल प्रयोग पर भी सख्त टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और केवल आंदोलन या विरोध प्रदर्शन होने मात्र से पुलिस को बर्बरता या लाठीचार्ज करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले इस अधिकार की रक्षा करना पुलिस और प्रशासन दोनों का कर्तव्य है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि भीड़ नियंत्रण के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पालन अनिवार्य है और इसके उल्लंघन पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। बिहार में नीट अभ्यर्थियों पर पुलिस फायरिंग की घटना का संज्ञान लेते हुए सांसद मनोज झा की याचिका पर भी न्यायालय ने गंभीर रुख अपनाया। याचिका में घटना की स्वतंत्र जांच और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई है। न्यायालय ने इस बात पर चिंता जताई कि छात्रों और युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाने के लिए घातक बल का प्रयोग किया जा रहा है। विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि पुलिस सुधारों पर प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन आज तक कई राज्यों ने नहीं किया है, जिसके कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पुलिस आधुनिकीकरण और प्रशिक्षण की कमी को भी प्रमुख वजह माना। पीठ ने टिप्पणी की कि भीड़ प्रबंधन, दंगा नियंत्रण और मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दिए बिना पुलिस से संयमित व्यवहार की अपेक्षा करना बेमानी है। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे पुलिस बल को पर्याप्त संख्या में सुरक्षा उपकरण मुहैया कराने के साथ-साथ समयबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रम सुनिश्चित करें। साथ ही, न्यायालय ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए एक समान राष्ट्रीय दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) बनाने के संकेत दिए, ताकि पुलिस की मनमानी और नागरिकों के अधिकारों के हनन, दोनों पर अंकुश लग सके। अंत में, सर्वोच्च न्यायालय की यह सुनवाई पुलिस सुधारों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि कानून के राज में न तो पुलिसकर्मी असुरक्षित रहने चाहिए और न ही नागरिकों की आवाज को बलपूर्वक दबाया जाना चाहिए। अब गेंद कार्यपालिका के पाले में है कि वह न्यायालय की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए पुलिस एक्ट में आवश्यक संशोधन करे, संसाधन उपलब्ध कराए और जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत बनाए। तभी एक भयमुक्त और न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना साकार हो सकेगी।