सोशल मीडिया दिग्गज मेटा के मुखिया मार्क जुकरबर्ग के लिए भारत की संसदीय समिति ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए तीन महीने के भीतर माफी मांगने का अल्टीमेटम जारी किया है। सूचना प्रौद्योगिकी पर बनी संसद की स्थायी समिति ने प्रधानमंत्री के भाषण संबंधी वीडियो को फेसबुक से हटाए जाने के मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना है। समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समयसीमा के अंदर मेटा की ओर से संतोषजनक खेद प्रकट नहीं किया गया तो कंपनी को मिलने वाला 'सेफ हार्बर' कानूनी संरक्षण वापस ले लिया जाएगा, जिससे प्लेटफॉर्म पर पोस्ट की जाने वाली सामग्री के लिए सीधे तौर पर मेटा कानूनी रूप से उत्तरदायी हो जाएगी। इस पूरे प्रकरण की गूंज सरकारी गलियारों में भी तेज है। सूत्रों के अनुसार, सरकार मेटा के शीर्ष अधिकारियों के साथ आगामी 5-6 अगस्त को होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) की रोकथाम में बरती गई ढिलाई और गलत खाता कार्रवाई जैसे गंभीर मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी। मेटा की वैश्विक टीम इस बैठक के लिए विशेष रूप से भारत आ रही है, जहां उनसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा उत्पन्न कंटेंट की निगरानी और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए कड़े सवाल किए जाएंगे। सरकार का रुख साफ है कि भारतीय कानूनों और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। संसदीय पैनल की इस कार्रवाई को डिजिटल संप्रभुता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। अभी तक 'सेफ हार्बर' प्रावधान के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यह दावा करते रहे हैं कि वे केवल मध्यस्थ हैं और उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के आधिकारिक संबोधन को बिना ठोस कारण बताए हटाने की घटना ने इस सुरक्षा कवच पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। समिति का मानना है कि जब कोई प्लेटफॉर्म संपादकीय भूमिका निभाने लगे और सत्ता पक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास करे, तो उसे मध्यस्थ की छूट नहीं दी जा सकती। विशेषज्ञों का कहना है कि इस टकराव का असर भारत की डिजिटल नीति और बड़ी टेक कंपनियों के संचालन मॉडल पर लंबे समय तक पड़ेगा। यदि मेटा इस चेतावनी को नजरअंदाज करती है तो भारत में उसके कारोबार पर गहरा असर पड़ सकता है, साथ ही अन्य वैश्विक प्लेटफॉर्म के लिए भी यह एक नजीर बनेगा। सरकार ने नए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून और आईटी नियमों के तहत पहले ही सख्ती के संकेत दे दिए हैं, ऐसे में मेटा के लिए अनुपालन ही एकमात्र रास्ता बचता है। अंततः यह पूरा घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब अपनी डिजिटल सीमाओं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी बड़ी ताकत से टकराने को तैयार है। जुकरबर्ग और उनकी टीम के पास अब दो ही विकल्प हैं: या तो वे भारतीय संसद की गरिमा का सम्मान करते हुए खेद प्रकट करें और व्यवस्था में सुधार करें, या फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बाजार में अपने भविष्य को दांव पर लगाएं। आने वाले तीन महीने इस दिशा में निर्णायक साबित होंगे।