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Breaking News: सड़कों पर मुखर, संसद में मौन: भारत की सबसे बड़ी जेन जेड आबादी की राजनीतिक अनुपस्थिति का विरोधाभास
🕒 1 hour ago

भारत की युवा पीढ़ी, जिसे जेनरेशन जेड कहा जाता है, आज सड़कों, सोशल मीडिया और विश्वविद्यालय परिसरों में अपनी आवाज बुलंद करती नजर आती है, लेकिन देश की सर्वोच्च विधायी संस्थाओं में उनकी उपस्थिति न के बराबर है। द इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी, द हिंदू, इकोनॉमिक टाइम्स और द हंस इंडिया की हालिया रिपोर्ट्स इस विरोधाभास को उजागर करती हैं कि विश्व की सबसे बड़ी जेन जेड आबादी वाले देश में, यह पीढ़ी संसद और विधानसभाओं में लगभग अदृश्य बनी हुई है। जहां एक ओर वे जलवायु परिवर्तन, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर मुखर विरोध प्रदर्शन करते हैं, वहीं नीति-निर्माण के गलियारों में उनकी भागीदारी नगण्य है। राजनीतिक रणनीतिकार नरेश अरोड़ा का मानना है कि जेन जेड पहली ऐसी मतदाता श्रेणी है जो पहचान की राजनीति - जाति, धर्म, क्षेत्र - से परिभाषित नहीं होती, बल्कि मानसिकता और मूल्यों से प्रेरित है। यह पीढ़ी पारंपरिक वोट बैंक की अवधारणा को चुनौती देती है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जेन जेड की संख्या विश्व में सर्वाधिक है, फिर भी भारत का मतदाता आधार सबसे युवा नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि युवा मतदाता पंजीकरण और मतदान में कम भागीदारी कर रहे हैं। इकोनॉमिक टाइम्स का विश्लेषण बताता है कि आगामी चुनावों में हिंदी पट्टी के राज्यों में जेन जेड मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते वे मतदान केंद्रों तक पहुंचें। वीसीके प्रमुख थिरुमावलवन का कथन है कि जेन जेड के नए युग के विरोध प्रदर्शन भारत के राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार दे रहे हैं। ये विरोध प्रदर्शन पारंपरिक धरना-प्रदर्शन से भिन्न हैं - ये डिजिटल सक्रियता, फ्लैश मॉब, ऑनलाइन याचिकाओं और वायरल अभियानों के माध्यम से संचालित होते हैं। किसान आंदोलन, सीएए-एनआरसी विरोध, और हालिया अग्निपथ योजना के विरोध में युवाओं की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह पीढ़ी सड़क पर उतरकर सत्ता को चुनौती देने से नहीं हिचकिचाती। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क की आवाज को नीति में बदलने के लिए संस्थागत भागीदारी अनिवार्य है। राजनीतिक दलों को युवाओं को केवल मतदाता नहीं, बल्कि उम्मीदवार और नेतृत्वकर्ता के रूप में तैयार करना होगा। टिकट वितरण में युवा उम्मीदवारों को वरीयता, आंतरिक लोकतंत्र में युवा विंग को वास्तविक अधिकार देना, और नीतिगत एजेंडे में युवा केंद्रित मुद्दों को प्राथमिकता देना - ये कुछ ठोस कदम हो सकते हैं। निष्कर्षतः, जेन जेड की राजनीतिक ताकत तब तक अधूरी रहेगी जब तक वह विधायी संस्थाओं में प्रतिबिंबित नहीं होती। सड़क पर विरोध और संसद में मौन का यह अंतराल लोकतंत्र के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि राजनीतिक दल इस पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझकर उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में लाते हैं, तो भारत एक अधिक समावेशी, प्रगतिशील और भविष्योन्मुखी लोकतंत्र की ओर अग्रसर हो सकता है। समय आ गया है कि युवा भारत केवल नारे लगाने वाला नहीं, बल्कि कानून बनाने वाला बने।

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✍️ By Pradeep Yadav | 05 Aug 2026