नागरिक अधिकार संगठन 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन के उस बयान का कड़ा प्रतिकार किया है, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश के 2024 के छात्र आंदोलन का हवाला देते हुए भारतीय परिप्रेक्ष्य पर टिप्पणी की थी। दीपके ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'हम अलग हैं' और भारत को बांग्लादेश या नेपाल की ओर देखने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे पास महात्मा गांधी जैसा विश्वव्यापी आदर्श मौजूद है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और नागरिक अधिकारों की रक्षा के मॉडल पर बहस छेड़ दी है। तस्लीमा नसरीन ने हाल ही में एक बयान में कहा था कि बांग्लादेश के छात्र आंदोलन ने 'हमें मूर्ख बनाया' है, जिसके बाद सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। अभिजीत दीपके ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सीजेपी का संघर्ष संविधान, कानून और गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं और यहां का नागरिक समाज गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ता आया है। किसी अन्य देश के मॉडल का अंधानुकरण करना भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं होगा। इस बीच, सीजेपी ने एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अपनी आवाज बुलंद की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि पीड़ितों को एक करोड़ रुपये का मुआवजा नहीं दिया गया तो वे धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे। यह मामला न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़ा हुआ है, जिस पर सीजेपी लंबे समय से पैरवी कर रही है। दीपके ने कहा कि गांधीवादी तरीके से आंदोलन करना हमारा संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सरकार की उदासीनता के चलते उन्हें सड़क पर उतरने के लिए विवश होना पड़ रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द प्रिंट और तेलंगाना टुडे जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रमुखता से कवर किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दीपके ने बार-बार दोहराया कि महात्मा गांधी केवल भारत के ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए शांतिपूर्ण प्रतिरोध के प्रतीक हैं। उनके अनुसार, जब हमारे पास गांधी जैसा महान पथप्रदर्शक है, तो हमें किसी अन्य देश के घटनाक्रम से प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं है। यह बयान वर्तमान राजनीतिक माहौल में नागरिक समाज की स्वतंत्र पहचान को रेखांकित करता है। निष्कर्षतः, अभिजीत दीपके का यह रुख न केवल सीजेपी की वैचारिक स्पष्टता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि भारतीय नागरिक समाज अपने संवैधानिक मूल्यों और गांधीवादी विरासत के प्रति प्रतिबद्ध है। तस्लीमा नसरीन के बयान पर हुई यह बहस इस बात का प्रमाण है कि अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में रचा-बसा है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि मुआवजे की मांग को लेकर सीजेपी का प्रस्तावित आंदोलन क्या रंग लाता है और सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है।