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Breaking News: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्य सरकारें छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ले सकती हैं, पुलिस ज्यादती पर भी सख्त टिप्पणी
🕒 58 minutes ago

उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि राज्य सरकारों के पास छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को कानून के अनुसार वापस लेने या बंद करने का पूरा अधिकार है। यह फैसला हाल ही में विभिन्न राज्यों में पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर हुए छात्र आंदोलनों के दौरान दर्ज हुए सैकड़ों मुकदमों के संदर्भ में आया है। न्यायालय की इस टिप्पणी से उन हजारों छात्रों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जिनके भविष्य पर पुलिस कार्रवाई की तलवार लटकी हुई थी। इस निर्णय को छात्र अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने बेहद संतुलित और कड़ा रुख अपनाते हुए दो टूक कहा कि न तो अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों को संरक्षण दिया जाना चाहिए और न ही आपराधिक गतिविधियों में लिप्त प्रदर्शनकारियों को। न्यायालय ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर बर्बरता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही न्यायालय ने यह भी ताकीद किया कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार संवैधानिक है, लेकिन इसकी आड़ में हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए। यह पूरा प्रकरण विभिन्न राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के बाद भड़के छात्र आक्रोश से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में छात्रों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले दागने के साथ ही बड़ी संख्या में छात्रों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए थे। इन कार्रवाइयों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बर्बरता की और झूठे मुकदमे लादकर उनके करियर को बर्बाद करने की कोशिश की। न्यायालय के इस रुख का कानूनी जानकारों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस स्पष्टीकरण के बाद राज्य सरकारों पर नैतिक और कानूनी दबाव बनेगा कि वे बदले की भावना से दर्ज मुकदमों को वापस लें। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के तहत ही पूरी करनी होगी, जिसमें अदालत की अनुमति आवश्यक होती है। इस फैसले से उन छात्रों के परिजनों में भी उम्मीद जगी है जो मुकदमों की वजह से अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित थे। अंत में, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लोकतंत्र में विरोध के अधिकार और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक ऐतिहासिक मानदंड है। यह संदेश देता है कि सत्ता की ताकत का दुरुपयोग करके युवाओं की आवाज को दबाया नहीं जा सकता, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि विरोध के नाम पर अराजकता फैलाने की इजाजत किसी को नहीं है। अब गेंद राज्य सरकारों के पाले में है कि वे न्यायालय की भावना का सम्मान करते हुए कितनी तत्परता से निर्दोष छात्रों को कानूनी पचड़ों से मुक्ति दिलाती हैं।

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✍️ By Pradeep Yadav | 03 Aug 2026