कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा है कि देश के पीड़ित छात्रों को प्रधानमंत्री की 'क्षमा' नहीं, बल्कि उनकी 'क्षमायाचना' चाहिए। नीट और यूजीसी-नेट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों से उपजे आक्रोश के बीच राहुल गांधी ने यह बयान देकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति गलती स्वीकार करने के बजाय माफ करने की मुद्रा में आता है, तो यह न्याय नहीं बल्कि अहंकार का परिचायक होता है। राहुल गांधी ने हाल ही में उन परिवारों से मुलाकात की जिनके बच्चों ने परीक्षा व्यवस्था की खामियों और अनिश्चित भविष्य के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया था। इन शोक संतप्त परिवारों का दर्द साझा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का 'माफी' मांगना एक तरह से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि छात्र और उनके अभिभावक व्यवस्थागत विफलता के शिकार हुए हैं, इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री की ओर से सच्चे मन से मांगी गई माफी यानी क्षमायाचना का हक है, न कि किसी दयाभाव से दी गई क्षमा का। विपक्षी दलों ने भी राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाते हुए प्रधानमंत्री के रवैये को 'गैसलाइटिंग' यानी वास्तविकता को नकारकर भ्रमित करने की कोशिश करार दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार परीक्षा प्रणाली की मूलभूत खामियों को स्वीकार करने के बजाय भावनात्मक अपील करके मुद्दे को भटकाना चाहती है। छात्र संगठन लगातार सड़कों पर उतरकर पुनर्परीक्षा, दोषियों पर कठोर कार्रवाई और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को भंग करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि केवल शब्दों के खेल से युवाओं का खोया विश्वास वापस नहीं जीता जा सकता। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने राहुल गांधी के बयान पर पलटवार करते हुए उनकी टिप्पणियों को 'असंतुलित और नफरत भरा' बताया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी देश के युवाओं के हित में लगातार कार्य कर रहे हैं और विपक्ष बेवजह राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगा है। इंद्रेश कुमार ने राहुल गांधी को 'सद्बुद्धि' के लिए प्रार्थना करने की बात कहकर विवाद को और हवा दे दी है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर देश की परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को केंद्र में ला खड़ा किया है। जहां एक ओर विपक्ष इसे नैतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही का प्रश्न बना रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे जांच प्रक्रिया का विषय बताकर टालने का प्रयास कर रहा है। इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच असली पीड़ित वे लाखों छात्र और उनके परिवार हैं, जिनका भविष्य अधर में लटका हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस विश्वास के संकट को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाती है या फिर यह मामला भी राजनीतिक जुमलेबाजी की भेंट चढ़ जाता है।