नोएडा की एक महिला के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन के सदस्य अभिजीत दीपके ने सीधा सवाल पूछा है कि आखिर भाजपा के नेताओं और सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामलों में कार्रवाई कब होगी? यह मामला अब दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया है, लेकिन इस पर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। सीजेपी का आरोप है कि अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है, जबकि सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों पर लगे गंभीर आरोपों को नजरअंदाज किया जा रहा है। सीजेपी के सौरव दास ने दावा किया है कि भाजपा के लगभग सौ सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, फिर भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने नोएडा की महिला का बचाव करते हुए कहा कि किसी की आलोचना करना या अपशब्द कहना कब से अपराध की श्रेणी में आ गया? संगठन का तर्क है कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार संविधान प्रदत्त है, लेकिन वर्तमान सरकार इस अधिकार को चुनिंदा तरीके से दबा रही है। महिला के खिलाफ दर्ज मामले को दिल्ली स्थानांतरित किए जाने के बाद भी सीजेपी का मानना है कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजामी और कानून के समान अनुप्रयोग पर बहस छेड़ दी है। सीजेपी के संस्थापक ने भी एफआईआर पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले दर्ज करना सरकार की असहिष्णुता को दर्शाता है। जहां एक ओर आम नागरिक की टिप्पणी पर त्वरित कार्रवाई होती है, वहीं दूसरी ओर सांसदों और विधायकों पर दर्ज गंभीर आपराधिक मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। यह दोहरा मापदंड न्यायपालिका और कानून व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में आईपीसी की धाराओं का प्रयोग अभिव्यक्ति की आजादी पर अनुचित अंकुश लगाने वाला कदम हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि सरकार की आलोचना या प्रधानमंत्री के खिलाफ असहमति राजद्रोह या अपमान की श्रेणी में नहीं आती। फिर भी, निचले स्तर पर पुलिस द्वारा ऐसी एफआईआर दर्ज करना चिंता का विषय है। सीजेपी ने मांग की है कि महिला के खिलाफ दर्ज मामला तुरंत वापस लिया जाए और भाजपा सांसदों पर लंबित आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जाए। निष्कर्षतः, यह मामला केवल एक महिला की टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में कानून के शासन और समानता के सिद्धांत की परीक्षा है। जब तक कानून का प्रयोग चुनिंदा लोगों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी के लिए समान रूप से होगा, तब तक न्याय की अवधारणा अधूरी रहेगी। सीजेपी द्वारा उठाए गए सवाल न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि ये व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करते हैं। अब देखना होगा कि न्यायपालिका और नागरिक समाज इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं।