अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के ऊर्जा संबंधी ठिकानों पर संभावित सैन्य कार्रवाई की खबरों ने पश्चिम एशिया में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। सीबीएस न्यूज़ और रॉयटर्स सहित कई प्रमुख मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देश ईरान के तेल प्रतिष्ठानों, बिजली संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे पर समन्वित हवाई हमले की योजना बना रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि ये हमले आने वाले दिनों में ही किए जा सकते हैं, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अभी तक अंतिम आदेश नहीं दिया है। विस्तृत खुफिया जानकारी के आधार पर तैयार की गई इस योजना में ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के साथ-साथ उसकी आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने की रणनीति शामिल है। अखबार 'एक्जिओस' ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ट्रम्प प्रशासन ईरान की बिजली आपूर्ति ठप करने के प्रस्ताव पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, अमेरिकी सेना के पास ईरान के खिलाफ कई नई सैन्य योजनाएं तैयार हैं, जिनमें साइबर हमले और विशेष बलों की तैनाती जैसे विकल्प भी शामिल हैं। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की वकालत करते रहे हैं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है। ईरान ने किसी भी हमले का 'विध्वंसक प्रतिक्रिया' देने की चेतावनी दी है और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दोहराई है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। रूस और चीन जैसे देशों ने संयम बरतने की अपील की है, जबकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने तनाव कम करने के लिए बातचीत का आग्रह किया है। खाड़ी देशों में भी आशंका है कि किसी भी सैन्य टकराव की आंच उनकी अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा ठिकानों पर हमला ईरान की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका देगा, लेकिन इससे क्षेत्र में व्यापक युद्ध भड़कने का खतरा भी बढ़ जाएगा। ईरान के पास मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क है, जिनके जरिए वह इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर पलटवार कर सकता है। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया समूह भी सक्रिय हो सकते हैं, जिससे संघर्ष बहु-आयामी रूप ले लेगा। फिलहाल सभी निगाहें व्हाइट हाउस पर टिकी हैं, जहां राष्ट्रपति ट्रम्प अंतिम फैसला लेंगे। कूटनीतिक गलियारों में अभी भी पर्दे के पीछे बातचीत की संभावना तलाशी जा रही है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। अगर हमला होता है तो यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका-ईरान टकराव का सबसे खतरनाक मोड़ होगा, जिसके नतीजे पूरे विश्व की शांति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेंगे।