उत्तरी अफ्रीका में स्थित स्पेन के छोटे से एन्क्लेव सेउता इन दिनों यूरोप के प्रवासी संकट का केंद्र बना हुआ है। मोरक्को की सीमा से सटा यह स्पेनिश क्षेत्र पिछले कुछ हफ्तों में हजारों प्रवासियों के आने का गवाह बना है, जिससे स्पेन ही नहीं बल्कि पूरे यूरोपीय संघ की सीमा नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, मई महीने में ही लगभग 60,000 से अधिक लोग मोरक्को से तैरकर या बाड़ पार करके सेउता में दाखिल हुए, जिनमें बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चे भी शामिल थे। इस अभूतपूर्व स्थिति ने स्पेन के सुरक्षा बलों को सकते में डाल दिया और मानवीय संकट को जन्म दे दिया। इस संकट की जड़ें स्पेन और मोरक्को के बीच चल रहे कूटनीतिक तनाव में निहित हैं। पश्चिमी सहारा के विवादित क्षेत्र पर स्पेन के रुख में बदलाव के बाद मोरक्को ने सीमा नियंत्रण में ढील दे दी, जिसका नतीजा प्रवासियों की बाढ़ के रूप में सामने आया। स्पेनिश प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने इसे "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा" करार देते हुए सेना तैनात की और हजारों प्रवासियों को तुरंत मोरक्को वापस भेज दिया। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने इस त्वरित निष्कासन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। अब तक इस अफरातफरी में कम से कम 57 लोगों के मारे जाने की खबर है। संकट का असर यूरोपीय संघ की आंतरिक सीमाओं पर भी पड़ा है। इटली ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए शेंगेन समझौते के तहत स्पेन के साथ अपनी हवाई और समुद्री सीमाएं अस्थायी रूप से बंद कर दीं। इटली का तर्क है कि सेउता से प्रवासी इटली की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे उसकी अपनी सीमा व्यवस्था चरमरा सकती है। यह फैसला यूरोपीय एकता में दरार का संकेत देता है और शेंगेन क्षेत्र की नाजुकता को उजागर करता है। यूरोपीय आयोग ने स्थिति पर चिंता जताते हुए स्पेन को सहायता की पेशकश की है, लेकिन प्रवासन नीति पर एकजुट रुख अब भी दूर की कौड़ी नजर आता है। स्पेन सरकार का दावा है कि स्थिति अब नियंत्रण में है और अधिकांश प्रवासी मोरक्को लौट चुके हैं। मगर जमीनी हकीकत अलग है - सेउता के अस्थायी शिविरों में अभी भी सैकड़ों लोग फंसे हुए हैं, जिनमें से कई बिना पंजीकरण के हैं। मोरक्को ने भी अपने नागरिकों को वापस लेने में आनाकानी की है, जिससे राजनयिक गतिरोध बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट यूरोप की टूटी हुई प्रवासन प्रणाली का लक्षण मात्र है, जहां सीमा सुरक्षा और मानवीय दायित्वों के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा है। आने वाले दिनों में इस संकट का समाधान स्पेन-मोरक्को संबंधों की बहाली और यूरोपीय संघ की एकीकृत प्रवासन नीति पर निर्भर करेगा। सेउता की त्रासदी ने एक बार फिर याद दिलाया है कि दीवारें और बाड़ मानवीय आकांक्षाओं को नहीं रोक सकते। यूरोप को अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ शरणार्थियों के अधिकारों और गरिमा का भी ध्यान रखना होगा, अन्यथा ऐसे संकट बार-बार दस्तक देते रहेंगे।