आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी भूमिका अब बदल गई है और वे इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर बोलेंगे। चड्ढा का यह बयान ऐसे समय आया है जब संसद में पेपर लीक रोधी विधेयक पर तीखी बहस चल रही है और विपक्ष सरकार पर हमलावर है। NEET विवाद ने देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है, जिसके चलते यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में बुधवार को सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक 2024 पारित हो गया। इस विधेयक का उद्देश्य परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल और अन्य अनुचित गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने वाला कदम बताया है। हालांकि, विपक्षी दलों ने इस विधेयक को "कॉस्मेटिक सुधार" करार देते हुए इसे अपर्याप्त बताया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग करते हुए सदन से वॉकआउट किया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार असली दोषियों को बचा रही है और केवल दिखावे के लिए कानून लाई है। NEET विवाद के तार कई राज्यों से जुड़े होने के कारण मामला और पेचीदा हो गया है। बिहार, गुजरात, राजस्थान समेत कई राज्यों में पेपर लीक के मामले सामने आए हैं, जिसके बाद छात्रों ने देशव्यापी प्रदर्शन किए। इन प्रदर्शनों के दौरान कुछ स्थानों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसमें पैलेट गन के इस्तेमाल की खबरें भी आईं। इस पर विपक्ष ने सवाल उठाते हुए कहा कि छात्रों की जायज मांगों को दबाने के लिए सरकार दमनकारी नीति अपना रही है। सरकार का कहना है कि नया कानून दोषियों को कड़ी सजा दिलाएगा और परीक्षा प्रणाली की पवित्रता बहाल करेगा। राघव चड्ढा ने अपनी बदली हुई भूमिका का जिक्र करते हुए इशारा किया कि वे अब संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाएंगे। उन्होंने मांग की कि NEET घोटाले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। चड्ढा ने यह भी कहा कि केवल कानून बना देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे प्रभावी ढंग से लागू करना भी उतना ही जरूरी है। उनकी इस सक्रियता से विपक्षी खेमे को नई ताकत मिली है। निष्कर्षतः, NEET विवाद और पेपर लीक रोधी विधेयक के पारित होने ने देश की परीक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे नाकाफी मान रहा है। छात्रों का भविष्य दांव पर है और वे न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अब देखना होगा कि नया कानून कितना कारगर साबित होता है और दोषियों पर शिकंजा कसने में कितनी सफलता मिलती है। इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।