उच्चतम न्यायालय ने पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि इसका प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। न्यायालय ने जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) द्वारा इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद का पूरा ब्योरा तलब किया है। इस फैसले को नागरिक अधिकारों और सुरक्षा बलों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पैलेट गन का इस्तेमाल अंतिम उपाय के तौर पर ही होना चाहिए। न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह जंतर मंतर प्रदर्शन के दौरान आरएएफ द्वारा चलाए गए पैलेट कारतूसों का विस्तृत रिकॉर्ड पेश करे। इसमें इस्तेमाल किए गए कारतूसों की संख्या, उनके प्रकार और किस परिस्थिति में चलाए गए, जैसी जानकारियां शामिल होंगी। इस बीच, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के महानिदेशक ने बल के जवानों को संदेश देते हुए कहा कि वे निर्भय होकर कर्तव्य निर्वहन करें, हर कार्रवाई की जिम्मेदारी वे स्वयं लेंगे। उनका यह बयान पैलेट गन विवाद के बीच जवानों का मनोबल बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, न्यायालय ने उस याचिका को अस्पष्ट बताया जिसमें नागरिक जमावड़े के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की गई थी, क्योंकि याचिकाकर्ता ने इसके लिए कोई ठोस कानूनी आधार पेश नहीं किया था। न्यायालय की इस टिप्पणी से सुरक्षा बलों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में नई बहस शुरू हुई है। मानवाधिकार संगठन लंबे समय से पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक की मांग करते रहे हैं, खासकर कश्मीर में इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद। अब न्यायालय द्वारा 'असाधारण परिस्थितियों' की शर्त लगाने से इसके दुरुपयोग पर अंकुश लगने की उम्मीद है। अंत में, यह फैसला लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। गोला-बारूद का ब्योरा सार्वजनिक होने से पारदर्शिता बढ़ेगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में मदद मिलेगी। न्यायालय की सक्रियता से नागरिक समाज में विश्वास मजबूत होगा कि राज्य शक्ति का प्रयोग संयम और जवाबदेही के साथ किया जाएगा।